Headline • मृत महिला को जिंदा दिखाकर कर लिया मकान का बैनामा, असली मालिक पर घर छोड़ने की धमकी• महिलाओं ने सरेराह प्रधान में चप्पलों और लाठियों से की पिटाई, पति पत्नी के झगड़े को सुलझाना पड़ा भारी• भारत-पाक मुकाबले का रोमांच चरम पर, कानपुर में फैंस ने बप्पा से की टीम इंडिया की जीत की प्रार्थना• पाकिस्तान ने टॉस जीता और पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय, क्या कमाल कर पाएगी रोहित एंड कंपनी?• जब कुर्ता पजामा पहनकर नानी के घर गणपति पूजा में पहुंचे तैमूर,फोटो और वीडियो वायरल• क्यों हो रही है यूपी के इस दरोगा की प्रशंसा, जान की बाजी लगाकर किया कमाल• 'ठग्स ऑफ हिंदोस्तान' से सामने आया फातिमा सना शेख का दमदार लुक,आमिर खान ने दी चेतावनी • रामकथा पर झूमे शिवपाल, कहा-समय बताएगा कौन किसके साथ है• साथ में बीड़ी पी रहे दोस्त की जेब में पैसा देखा तो लालच आ गया, ईंट मारकर हत्या कर पैसे ले लिए• शिकायत करने पर नहीं सुनी लेकिन जब आत्मदाह करने पहुंचा गरीब आदमी तो तुरंत जांच बैठा दी• चंद्रशेखर रावण और मदनी में गोपनीय बातचीत, शेरसिंह राणा ने भी पेश कर दी चुनौती• राजा भैया के पिता और प्रशासन में ठनी ! मोहर्रम के दिन भंडारे के कार्यक्रम में प्रशासन ने लगाई रोक• तीन तलाक पर मोदी सरकार का बड़ा फैसला,अध्यादेश को दी मंजूरी• शामली : मठुभेड़ में दो बदमाश गिरफ्तार, एक को लगी गोली, 10 लाख कैश बरामद • दरोगा के बेटे ने खुद को गोली मारकर की आत्महत्या, मां की बीमारी के चलते डिप्रेशन में था• बीजेपी विधायक देवेंद्र राजपूत की दबंगई, बिजली विभाग के जेई को पीटा,वीडियो वायरल• बहराइच में बुखार का कहर, 45 दिनों में 70 बच्चों की मौत• 'समाचार प्लस' की खबर का असर,विकिपीडिया ने सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत का निक नेम 'झांपू' हटाया• ब्लॉक प्रमुख से फोन पर मांगी गई 5 करोड़ की रंगदारी, न देने पर जान से मारने की धमकी• कानपुर : रैगिंग को लेकर भिड़े मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र,आधा दर्जन घायल• मेरठ : पुलिस और बदमाशों के बीच मुठभेड़, एक बदमाश को लगी गोली• एशिया कप में अफगानिस्तान ने श्रीलंका को हराकर सभी को चौकाया• राज्यपाल ने की योगी सरकार की प्रशंसा, कहा-डेढ़ साल में बहुत बेहतर हुई है कानून-व्यवस्था• कांग्रेसियों ने लोगों को लॉलीपॉप बांटकर पीएम की 557 करोड़ की योजनाओं का उड़ाया मजाक• इलाहाबाद ने नहीं निकलेगा मुहर्रम का जुलूस, ताजिएदारों ने गड्ढों के कारण लिया फैसला


जेएनयू विवाद के बाद से देश में 'देशभक्ति बनाम राष्ट्रवाद' की बहस शुरू हो गई। जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगे, जो वाकई में गलत हैं। हम भारतवासियों के लिए हमारा देश उतना ही प्यारा है जितना किसी अमेरिकी, इंग्लिश या पाकिस्तानी के लिए उनके देश होंगे। और युवा होने के नाते मैं ये बात कह सकता हूं कि हम अपने देश को, यहां के सिस्टम को कितना भी भला बुरा कहें, लेकिन बात जब देशप्रेम की आती है तो हम ये बताने से कभी पीछे नहीं हटते कि हम देशप्रेमी हैं। और ये सिर्फ हमारे साथ ही नहीं है। दुनिया के सभी देशों में ऐसे युवा मिलेंगे जो अपने यहां की सरकार, शासन प्रणाली से भले ही खुश ना हों, लेकिन अपने देश को वे प्यार करते हैं।

 लेकिन ये राष्ट्रवाद क्या है ? सच कहूं तो मेरे लिए ये नया शब्द है। क्योंकि अब से पहले मैं सिर्फ देशभक्ति के बारे में ही सुनता था। कुछ लोग कहते हैं कि देशभक्ति का पर्यायवाची राष्ट्रवाद है। जबकि ज्यादातर कहते हैं कि कट्टर देशभक्ति वास्तव में राष्ट्रवाद है। अगर ऐसा ही है तो माफ कीजिएगा, लेकिन मैं इसे खारिज करता हूं। फिर मैं राष्ट्रवादी नहीं हूं। क्योंकि कट्टर शब्द मुझे पसंद नहीं

'अगर कोई भारत में रहकर भारत माता की जय नहीं बोल सकता तो उसे यहां रहने का अधिकार नहीं है, वो पाकिस्तान चला जाए'। यार पाकिस्तान क्यों चला जाए ? भारत माता के जय ना बोलने से कोई पाकिस्तान समर्थक हो जाता है क्या ? मुझे याद नहीं मैंने आखिरी बार भारत माता की जय कब बोला था। शायद स्कूली दिनों में बोला होगा। उसके बाद से कभी नहीं बोला। तो ? आप मुझे पाकिस्तान भेज देंगे ? आप कौन होते हैं ? और आपने ये कैसे तय कर दिया कि अगर मैं भारत माता की जय नहीं बोल रहा हूं तो मैं पाकिस्तान समर्थक ही हूं ? आप मेरे मन के अंदर झांक चुके हैं क्या ? नहीं। अभी तक नही। क्योंकि अभी तक ऐसी कोई तकनीक नहीं आई है कि किसी इंसान का मन पढ़ लिया जाए। और अगर कोई ऐसी तकनीक होगी भी तो आप पाएंगे कि मैं देशभक्त हूं। और ये भी पाएंगे कि मैं राष्ट्रवादी नहीं हूं। क्योंकि मैं कट्टर नहीं हूं।

मैं कहीं पढ़ रहा था कि कुछ साल पहले एक थिएटर में फिल्म प्रसारण के दौरान राष्ट्रगान बजा तो थिएटर हॉल में सिर्फ तीन लड़कियां खड़ी हुईं। लेखक और उनका परिवार बैठा रहा। लेखक के पिता ने जब ये देखा तो उन्हें महसूस हुआ। उन्होंने लेखक को बताया कि देखो, सिर्फ तीन लड़कियां खड़ी हुईं। उस परिवार को ये बात इतनी छू गयी कि उसके बाद से गणतंत्र दिवस की परेड के बाद बजने वाले राष्ट्रगान पर घर में भी वो लोग खड़े हो जाते थे। 3 लड़कियों ने सिर्फ अपना फ़र्ज़ निभाकर दूसरों को फर्ज़ निभाने के लिए प्रेरित कर दिया। और यही मैं भी करता अगर मैं वहां होता। प्रेम कोई भी हो, महसूस होने की चीज़ है। मार-पीट कर महसूस नहीं करवाया जा सकता। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप किसी कुंठा के शिकार हैं जिसके बारे में शायद आप ही पता लगा पाएं।

हमारे संविधान में ये साफ-साफ लिखा है कि हम लोकतांत्रिक देश हैं। हम धर्मनिरपेक्ष समाज हैं। तो जान लीजिए आप लोग अगर आप इनमें से किसी भी बात को चुनौती देते हैं तो आप देश के संविधान को गाली दे रहे हैं। फिर आप देशप्रेमी कैसे हो सकते हैं ? और इस तरह राष्ट्रवादी होना अपने आप ही गलत हो जाता है।

अगर आप भारत माता की जय बोलने के लिए किसी पर दबाव बना रहे हैं, मारपीट कर रहे हैं तो आप संविधान का अपमान ही कर रहे हैं। ये ठीक वैसा ही है जैसे आप लड़कियों को कपड़े पहनने की तमीज सिखा रहे हैं।

आप ये साबित करने पर तुले हुए हैं कि आप जहां पैदा हुए हैं सिर्फ वही देश अच्छा है, दुनिया के बाकि देश घटिया या आपके देश से कमतर हैं। तो आपको ये भी सोचना चाहिए कि आपकी तरह दुनिया के हर देश का नागरिक ये सोच सकता है। और फिर उसकी नजर में आपका देश भी उसके देश से कम ही है।

भारत के सभी नागरिक अपने देश से प्यार करते हैं। हमारे खिलाड़ी जब अच्छा खेलते हैं तो हम उन पर, खुद पर, गर्व करते हैं। यही तो देशप्रेम है। लेकिन अगर खिलाड़ी खराब खेले, तो हम उसके घर पर पत्थर फेंकने लगें तो ये देशभक्ति नहीं है। अगर राष्ट्रवाद हो तो मुझे पता नहीं।

राष्ट्रवाद नाम का झंडा बुलंद करने वालों से पूछना चाहूंगा कि क्या कभी आपने किसी को टैक्स चोरी ना करने की सलाह दी है ? क्या आपने लोगों को ईमानदारी से अपना काम करने की सलाह दी है ? आपने कभी खुद को सड़क पर गंदगी फैलाने से रोका है ? आपने कभी दूसरों को ऐसा करने से रोका है ? आपने कभी रिश्वत लेने या देने के बाद ये सोचा है कि आप देश के साथ न्याय कर रहे हैं या नहीं ?

एनआरई भी देश से लगाव रखते हैं। उनकी राष्ट्रभक्ति पर आप कभी संदेह नहीं करते। यहां रहने वाले भी देश से प्यार करते हैं। उनको शक की निगाह से क्यों देख रहे हैं ? देश से प्यार वो लोग भी करते हैं जो देश के बारे में ज्यादा बात नहीं करते। और वो भी जो देश में मौजूद कमियों के बारे में बात करते हैं।

उनके बारे में सोचिए जो लोग भारतीय भी हैं और दूसरे देशों की नागरिकता भी उनके पास है। आपने कभी सुना है कि दक्षिण अफ्रीका से क्रिकेट मैच में भारत की जीत पर ताली बजाने पर वहां रह रहे भारतीयों पर देशद्रोह का मुकदमा किया गया है ? नहीं सुना होगा। लेकिन अगर भारत में भारतीय टीम अफ्रीका से हार जाए और कोई टीवी चैनल कुछ भारत में रह रहे अफ्रीकियों को अफ्रीका की जय जयकार करते दिखा दे तो जरूर तथाकथित राष्ट्रवादियों की भावनाएं आहत हो जाएंगी। ये डबल स्टैंडर्ड क्यों भाई ? हम क्यों पाकिस्तान की तरह जबरदस्ती चीजें लोगों पर थोपना चाहते हैं ?

कमियां हर जगह हैं। बाकि देशों की तरह हमारे यहां भी तमाम कमियां हैं। लेकिन क्या हम सवा सौ करोड़ भारतीयों के चीखने से कि हम महान हैं, दुनिया इसे मान लेगी ?

अपने देश में न्याय और बराबरी के लिए लड़िये और अच्छे नागरिक के फर्ज पूरे करिये। संविधान में लिखे गए कर्तव्यों को निभाइए। संविधान में लिखे कर्त्तव्य भी थोपे नहीं जा सकते हैं। कोई भारत की जय नहीं बोले तो उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है लेकिन किसी के साथ मार-पीट करने पर आप कानून की नजर में दोषी जरूर होते हैं। आप ऐसी मानसिकता रखते हैं या ऐसा काम करते हैं तो आप बिलकुल राष्ट्र का अपमान कर रहे हैं।

 

लेखक- नाहिद

 



 

 

 



 



 

 

 

जाट आंदोलन ने फिर से ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या आंदोलन का मतलब गुंडागिरी है। इसके पहले गुजरात के पटेल आंदोलन के समय भी इस सवाल ने सिर उठाया था मगर लोगों ने ध्यान नहीं दिया। इसी पटेल आंदोलन को फोकस कर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि गुजरात में पटेल आंदोलन के दौरान जो नुकसान हुआ, उसका मुआवजा नुकसान पहुंचाने वालों से लिया जाना चाहिए। जाट आंदोलन में फिर से वही सब कुछ बल्कि उससे भी बढ़कर हुआ जिसकी उम्मीद तो दूर इस देश के सभ्य समाज में उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

इसमें कोई दो राय नहीं कि आंदोलन का मकसद लोगों की सोच औऱ विचार को बदलना होता है लेकिन जाट आंदोलन जैसे आंदोलनों के मायने क्या हैं इसका जवाब अभी बाकी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंसक आंदोलन ना केवल लोगों को चौंकाते हैं बल्कि मीडिया में भी ऐसे आंदोलन को जगह ज्यादा मिलती है। लेकिन ये भी सच है कि केवल अहिंसक आंदोलनों को ही कामयाबी मिलती रही है। हिंसक आंदोलनों से थोड़ा बहुत जो बदलाव आता भी है वो टिकाऊ नहीं होता। जाट आंदोलन को ही लीजिए आज जिस तरह इस आंदोलन पर सवाल उठने लगे वो किसी भी आंदोलनकारी को सकून देने वाला नहीं हो सकता। देश के आंदोलन इतिहास में जाट आंदोलन को सबसे अराजक हिंसक आंदोलन के रूप में जाना जाने लगा है। सच भी है 40 हजार करोड़ रूपये का नुकसान जिस आंदोलन से हो उसे जायज कैसे ठहराया जा सकता है। पिछले साल गुजरात में पटेल आंदोलन में भी काफी नुकसान हुआ। 15 दिनों तक पूरे गुजरात में हालात तनावपूर्ण रहे। तेलांगना औऱ झारखंड जैसे राज्यों में भी आंदोलन हुए औऱ रिपोर्टों के मुताबिक तो तेलांगना बनने में करीब 1 लाख करोड़ का नुकसान हुआ इतने पैसों में तेलांगना का काफी विकास हो सकता था। पश्चिम बंगाल में हुए सिंगूर आंदोलन में 75 हजार करोड़ का नुकसान हुआ था।

दूसरी तरफ कुछ आंदोलन ऐसे भी हैं जो अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहे और उनका असर भी काफी बड़ा औऱ व्यापक रहा। अन्ना आंदोलन को ही लीजिए मौजूदा समय के बड़े आंदोलनों में से एक अन्ना आंदोलन इतना फैला कि पूरे देश में भ्रष्टाचार को लेकर नई बहस शुरू हो गई। पहली बार किसी बिल को बनाने के लिए सिविल सोसायटी के लोगों को मिलाकर एक कमेटी बनाई गई। निर्भया आंदोलन ने महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए देश में सख्त कानून बनवा दिया। एक आनलाइन आंदोनल तो इतना प्रभावी हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल आईटीएक्ट की धारा 66ए को ही रद्द कर दिया। आरटीआई एक्ट भी अहिंसक आंदोलन का ही परिणाम है।

वर्तमान समय में जन आंदोलन की परिभाषा दिशा और दशा दोनों बदल गई है समय के साथ होने वाला स्वाभाविक परिवर्तन तो ठीक है मगर जब आंदोलन का आधार ही परिवर्तित हो जाए तो दो देश औऱ आंदोलन दोनों के लिए ही जाट आंदोलन जैसा छाप ही छोड़ पाता है इसका कोई नतीजा निकलता नहीं।

 

(लेखक आलोक वर्मा समाचार प्लस के एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं)

 

अभी-अभी कुछ ही दिन हुए हैं उन्हें उत्तर प्रदेश का डी० जी० पी० बनाया गया है....उत्तर प्रदेश जिसे   अभी कुछ दिनों से खूबसूरत और रंगारंग विज्ञापनों के माध्यम से उम्मीदों का प्रदेश बताया जा रहा है वहां की जनता को हमेशा की तरह ही इस बार भी मनभावन उम्मीद दी गयी कि नए डी० जी० पी० साहब आये हैं और ये साहब प्रदेश की लचर कानून व्यवस्था में जबरदस्त सुधार ले आयेंगें....लेकिन यह सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था में यदि वास्तविकता में सुधार आ जाये तो यह अपने आप में घटने वाली एक असाधारण बात होगी....जाहिर है असाधारण लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अतुलनीय कार्य करना होगा....इसी कड़ी में नियुक्ति होने के कुछ दिन बाद ही हमारे प्रदेश के डी० जी० पी० साहब ने इस बारे में आधी सफलता भी प्राप्त कर ली....हालाँकि इससे प्रदेश की बद से बदतर होती जा रही कानून व्यवस्था में कोई सुधार तो नहीं आया पर डी० जी० पी० साहब ने अतुलनीय कार्य ज़रूर कर दिया....एक अद्भुत सम्बोधन देते वक़्त वह अत्यधिक भावुक हो गए और शायद यह भूल गए कि वो ज़ुर्म और अपराध के दहशत भरे माहौल से जूझने वाली उत्तर प्रदेश की आम जनता नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के पुलिस विभाग के सेनापति हैं....खैर यह कोई माहौल रहा हो ,उनके दिल का हाल रहा हो या फिर उन्हें कोई व्यक्तिगत मलाल रहा हो....जो भी हो डी० जी० पी०  साहब अपने ही सिपहसालारों से खुश नहीं है....और इन्तेहाँ तो तब हो गयी जब वो खुलेआम कहने लगे कि प्रदेश के अधिकतर जिलों के एस० पी० लुटेरों से भी बदतर काम कर रहे हैं....वो यहीं तक नहीं रुके बल्कि उन्होंने कुछ अपराधों की प्रकृति का विश्लेषण भी कर दिया, कि तमाम गैरकानूनी काम जैसे जबरन उगाही,ट्रांसफर पोस्टिंग की दलाली और जमीनों पर अवैध कब्ज़े करने में कई कप्तान लिप्त हैं....जैसे ही यह बात निकली लोग आश्चर्य में पड़ गए, आश्चर्य इस बात का नहीं था कि पुलिस डिपार्टमेंट के कुछ लोग गैरकानूनी धंधों में लगे हुए हैं या उनके सहयोग से ये धंधे चल रहे हैं, क्योंकि अमूमन इस बारे में लोग जानते हैं....अचरज इस बात का है कि प्रदेश के पुलिस विभाग की कमान खुद सँभालने वाला व्यक्ति अगर ऐसी बातें करेगा तो पुलिस डिपार्टमेंट के कुछ ईमानदार लोग जो जमीन पर कानून की गरिमा बचाये हुए हैं उनके मनोबल पर क्या प्रभाव पड़ेगा,उन्होंने इसकी तनिक भी चिंता नहीं की....साहब कम से कम इस बात की तो फ़िक्र कर लेते कि प्रदेश की जनता के मन में  कानून व्यवस्था के ठीक होने की जो मृग मरीचिका व्याप्त रहती हैं उसका अस्तित्व तो बना रहता....लेकिन डी० जी० पी० साहब के आत्मविश्वास के क्या कहने जैसे ही विभाग के सर्वोच्च पद की जिम्मेदारी मिली तो उन्होंने इसे अधिकार समझकर जो मन में आया कह दिया....मसला ये है कि अगर ज़िम्मेदारी नहीं निभानी थी और सिर्फ आरोप लगाकर अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला ही झाड़ना था तो साहब राजनीति में शामिल होकर नेता जी बन जाते और मंच से कुछ भी कह देते, आपके पिछलग्गू तो यही कहते नेता जी संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं, बात समझ में भी आती हैं....लेकिन गौर कीजिये ये ज़रा दूसरे हालात हैं आप पर पूरे प्रदेश के कानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी है,अगर प्रदेश स्तर का मुख्य अधिकारी अपने से निचले अधिकारियों को नकारा या गलत बता कर अथवा उन पर आरोप लगाकर अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश करेगा तो फिर यह प्रक्रिया तो पूरे विभाग में लागू हो जाएगी....डी० जी० पी० साहब कप्तानों को दोषी करार दे रहे हैं, ऐसे में कप्तान एस० एच० ओ० को, एस० एच० ओ० दरोगा को,दरोगा कांस्टेबल को और कांस्टेबल सिपाही को दोषी करार दे देंगें....और अंत में जब पुलिस विभाग की सबसे छोटी इकाई यानि कि किसी सिपाही से इस बारे में बात करेंगे तो भोलेपन,मज़बूरी,कुंठा और क्षोभ के मिले जुले भाव में वह यही कहता है कि हम क्या कर सकते है साहब जैसा बड़े साहब बोलते हैं हम वैसा ही कर देते हैं....भाई पूरी नौकरी जो ठीक से करनी है....वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं जो यह कह रहे हैं कि ये डी० जी० पी० साहब की ईमानदारी है, कि उन्होंने बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखी है.... अब ये रायबहादुर लोग समाजिक स्तर पर समालोचक हैं या व्यक्तिगत स्तर पर चाटुकार या फिर हद से ज़्यादा आशावादी जो भी हो पुलिस विभाग के गलियारे में डी० जी० पी० साहब की ईमानदारी वाले किस्से तो हमने भी सुन रखे है....डी० जी० पी० साहब कितने ईमानदार और खरे है ये तो हम भी जानते हैं....खैर तकलीफ इस बात की नहीं है कि कौन क्या है....तकलीफ इस बात की है कि जिसकी जो ज़िम्मेदारी है वह ज़िम्मेदारी ठीक से न निभा कर प्रमुख लोग अपने कर्तव्य पथ से भटक रहे हैं ....आलम यह है कि उत्तर प्रदेश के पुलिस विभाग के मुख्य अधिकारी नेताओं की तरह बयान दे रहे हैं,नेता अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं,अपराधियों के हाथ में कानून व्यवस्था हैं,ऐसे चक्रव्यूह जैसे माहौल में प्रदेश की आम जनता की सुरक्षा के लिए अर्जुन जैसे व्यक्तित्व की आवश्यकता है जबकि पुलिस विभाग के मुखिया भीष्म पितामह की तरह कानून व्यवस्था का चीरहरण होते हुए देख रहे हैं.... उत्तर प्रदेश में पत्रकार जलाये जा रहे हैं,थाने में महिलाओं को अपमानित किया जा रहा है,आये दिन हत्याओं की ख़बरें सामने आ रहीं हैं,छोटे- मोटे अपराधों की संख्या तो पूछिये ही  मत....और नेतृत्व करने वाले लोग जिम्मेदारी भरा कदम उठाने की जगह अपने ही विभाग के लिए नकारात्मक बयान देकर अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए बौद्धिक बहाने खोज रहे हैं....ये बयानबहादुरों के व्यवहारिक बुद्धिहीनता का ही उदाहरण हैं....ऐसे में जुर्म और अपराधियों की दहशत से परेशान दीन-हीन जनता की सुरक्षा कौन करेगा ? एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार समस्या का सामना करने में जितनी तकलीफ नहीं होती उससे ज़्यादा तकलीफ समस्या के बारे में सोंचकर होती है....अगर गौर करेंगें तो उत्तर प्रदेश की जनता का भी यही मनोविज्ञान है अपराध की पीड़ा जो झेल रहे हैं वो तो झेल ही रहे हैं लेकिन अपराध घटने की संभावना के माहौल से लोग ज़्यादा पीड़ित है ऐसे में डी० जी० पी० साहब का बेबाक बयान इस मनोवैज्ञानिक पीड़ा में इज़ाफ़ा ही करता है....विश्व के महान साम्राज्यों में शुमार रोमन साम्राज्य बयानों के बल पर नहीं बल्कि ज़मीन पर युद्ध लड़कर स्थापित किया गया था....करिश्माई नेपोलियन बोनापार्ट इसलिए फ्रांस को ताकतवर बना पाया क्योंकि उसे भरोसा था कि वह कोई भी असंभव कार्य कर सकता था....इन दो उदाहरणों से मैं अपने इतिहास के ज्ञान का बखान नहीं कर रहा हूँ बल्कि दो विशेष बातों को सामने लाना चाहता हूँ और वो हैं संघर्ष करने की इच्छा और प्रबल आत्मविश्वास जिनकी सबसे अधिक आवश्यकता हमारे प्रदेश के पुलिस विभाग को है क्योंकि पुलिस विभाग की प्रमुख ज़िम्मेदारी अपराध और अपराधियों पर नियंत्रण रखना है और यकीन मानिये यह ज़िम्मेदारी युद्ध लड़ने से कम नहीं है,जो कि बयानों या बातों से पूरी होने वाली नहीं.....अब ज़ाहिर सी बात है किसी व्यक्ति को बड़ी ज़िम्मेदारी इसलिए सौपीं जाती है कि वह समस्या का समाधान खोजे नहीं तो समस्याओं का विश्लेषण और उस पर ज्ञान का तड़का तो उत्तर प्रदेश के नुक्कड़ों, चौपालों,चाय और पान की दुकानों तथा फेसबुक और ट्विटर पर बहुतायत मात्रा में प्राप्त हो रहा है....फिर बहुत बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि बड़े पद की ज़िम्मेदारी और गरिमा क्या होती है? क्या इसे सुनिश्चित किया जायेगा?....अंत में सभी उच्च पद पर बैठे हुए अधिकारियों से यही निवेदन है कि वह अपनी ज़िम्मेदारी सही से निभाते हुए समस्याओं का समाधान खोजें....यदि वे ठीक से ज़िम्मेदारी नहीं उठा पा रहे हैं तो कम से कम रायबहादुर और बयानबहादुर बनकर अपने और अन्य  लोगों के लिए व्यर्थ की समस्याएं खड़ी न करे.... नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि सरकारी अधिकारियों के नकारापन से आज़िज़ आकर प्रदेश की जनता खुद खड़ी हो जाये और कानून व्यवस्था स्वयं अपने  हाथों में लेकर सड़कों पर उतर आये और चारों तरफ कान के परदे फाड़ देने वाला शोर सुनाई देने लगे,इंक़लाब ज़िंदाबाद....माननीयों अभी भी समय है जाग जाइये....जय हिन्द (लेखक प्रवीण साहनी समाचार प्लस के कार्यकारी संपादक हैं)

जेएनयू का सच: आलोक वर्मा

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो कुछ भी हुआ उसके बाद देखते-देखते पूरा देश सुलग गया। हर वर्ग दो वर्ग में बंट गया..। लोगों की देभक्ति और बुद्धिजीविषा अचानक जग गई जग ही नहीं गई वो हर उस माध्यम का इस्तेमाल भी करने लगी जहां से उद्गार व्यक्त किए जा सकते थे। कुछ लोगों की विशेषज्ञता तो यहां तक बढ़ी कि वो छुपी हुई राजनीतिक मंशा के जानकार भी बन गए।

 

मगर किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की है कि जहां और जिस वीडियो से ये मुद्दा शुरू हुआ उस वीडियो का हश्र क्या हुआ। आखिरकार पुलिस ने वीडियो के आधार पर मुकदमा क्यों कर दिया और आम तौर पर साधारण चोर की जांच में भी हर कुछ छिपा कर चलने वाली दिल्ली पुलिस के मुखिया बीएस बस्सी इस पुरे मुद्दे पर बार बार यू टर्न लेते क्यों नजर आए।

 

क्राइम कवरेज का एक लंबा कैरियर रखने के नाते मैं इतना तो जानता हूं कि अगर आपके घर किसी तरह का हादसा हो जाए और आप दिल्ली के किसी थाने में पहुंचे तो आज भी मुकदमा दर्ज करवाना इतना आसान नहीं होता। मगर जेएनयू के मामले पर महज एक चैनल के वीडियो को आधार बनाकर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया गया। वैसे अगर हमारी धरती पर खड़े होकर कोई हमें ही गाली दे तो उसके खिलाफ कार्रवाई तो होनी ही चाहिए मगर फिर कार्रवाई का इरादा पक्का हो। किसी की इच्छा, जल्दबाजी से संचालित ना हो। इस मामले में पुलिस ने जिस वीडियो को मुकदमे का आधार बनाया उसी वीडियो की सत्यता की पुष्टि होने में अभी भी कम से कम एक सप्ताह लगेंगे। क्योंकि इस वीडियो को सीएफएसएल भेजा गया है औऱ रिपोर्ट आनी बाकी है।

 

जेएनयू में जो हुआ उसका पुलिस कार्रवाई के सार्वजनिक होने के बाद जो भी हुआ वो शायद काफी हद तक स्वाभाविक ही था। देश के लिए प्रेम रखने वाले तो प्रतिक्रियात्मक संकेत देंगे ही लेकिन इस पूरी कार्रवाई को राजनीतिक मंशा और एक खास संगठन से जोड़ देना क्या जाएज है।

 

क्या ये सच नहीं कि पुलिस कमिश्नर या कोई भी पुलिस अधिकारी किसी भी मामले की जांच पर जांच का हवाला देकर ज्यादातर बातें बताने से कतराते हैं मगर इस मामले मे वीडियो से लेकर पुलिसिया रिपोर्ट के कागजात तो बाहर आए ही पुलिस कमिश्नर खुद बार बार बयान देते रहे। कभी कहा कि सबूत हैं कभी कहा कि जमानत का विरोध नहीं करेंगे कभी कहा विरोध करेंगे। मगर जब उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात आई जिनके खिलाफ मुकदमा दर्ज था तो अचानक दिल्ली पुलिस ने शरीफ रवैया अपना लिया। वो यूनिवर्सिटी में रहे औऱ पुलिस बाहर अपने अपार सब्र की सीमा दिखाती रही। आखिर क्यों क्या उनकी गिरफ्तारी में देरी से देश में उनके पक्ष या विपक्ष में हवा नहीं फैल रही थी क्या उससे हमारे देश के साम्प्रादायिक सद्भावना के माहौल में किसी तरह का गड़बड़ी नहीं हो रही थी। औऱ सबसे बड़ी बात तो ये कि क्या जांच में देरी नहीं हो रही थी। आमतौर पर तनावपूर्ण माहौल होने पर पुलिस अपना गुपचुप कार्रवाई इतनी तेजी से करती है कि जल्दी किसी को खबर तक नहीं लगती। मगर इस मामले में दिल्ली पुलिस भी एक राजनीतिक पक्ष बन गई और इसीलिए किसी को सरकारी मंशा पर सवाल उठाने का मौका भी मिला।

(लेखक आलोक वर्मा समाचार प्लस के एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं)

 

आरोप- प्रत्यारोप: प्रवीण साहनी

एक बड़ी प्रचलित कहावत है कि एक अच्छी शुरुआत आधी सफलता की निशानी है लेकिन मैंने राजनीति का अध्ययन करने से पाया कि किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना सफलता की आधी निशानी है या कभी-कभी पूरी राजनीतिक सफलता सिर्फ जोर शोर से लगाये गए आरोपों पर निर्भर करती है....वर्ष 2014 में 16वीं लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस के खिलाफ जोरों का माहौल था, अब यह घोटालों की सरकार थी, महंगाई बढ़ाने वाली सरकार या फिर मूक और कमजोर प्रधानमंत्री की सरकार अथवा हर मोर्चे पर विफल सरकार (ये मनमोहन सरकार पर लगाये गए तत्कालीन आरोप हैं)....लेकिन परिणाम भाजपा की ऐतिहासिक जीत के रूप में सामने आया....हालाँकि कांग्रेस सरकार के पतन की नींव 27 फरवरी 2011 में रख दी गयी थी जब कांग्रेस के खिलाफ बाबा रामदेव ने आरोपों का बिगुल फूंका ,जिससे देश भर में एक लहर उठ गयी....इस उत्साही लहर के उठने के कई कारण हो सकते हैं, योग्य विश्लेषक उसका विश्लेषण कर सकते हैं ,लेकिन मेरे व्यक्तिगत विश्लेषण से यह बात समझ में आती है कि मीडिया चैनलों को रामलीला मैदान पर ख़बरों के लिए रोमांचक माहौल मिला और साथ ही साथ मीडिया जगत की बड़ी हस्तियों ने इस घटनाक्रम को बड़े जोश -खरोश से कवर किया....अब यह जनता की भावनाओं का उबाल था या बाबा रामदेव के शिष्यों की भक्ति, जो भी हो लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचे....बाबा जी ने उद्घोष किया कि विदेश में भारी मात्रा में कालाधन जमा है और जिसकी जिम्मेदार कांग्रेस सरकार है....इतना ही नहीं उन्होंने अंकगणित के प्रयोग के माध्यम से यह भी बताया कि अगर विदेशों में छुपा काला धन वापस आ जाये तो पूरे भारत की गरीबी मिट सकती है....आम जीवन के संघर्षों से रोजाना दो चार होती आम जनता को यह बात बड़ी राहत देने वाली लगी और राहत लगे भी क्यों न,सुनने में तो अच्छा लगता ही है, काले धन की वापसी और देश से गरीबी की समाप्ति....बाबा रामदेव काला धन वापस ला पाते और देश की समस्याएं सुलझा पाते कि इससे पहले रामलीला मैदान पर दिल्ली पुलिस जा पहुंची और आनन फानन में बाबा रामदेव जी को वहां से भागना पड़ा....भागते वक़्त उन्होंने किसके कपड़े पहन रखे थे यह महत्वपूर्ण विषय नहीं है.... वह बात अलग है कि इस मुद्दे पर भी टीवी चैनलों पर काफी रोमांचित करने वाली बहस चली.... इन दिनों घरों में दिन भर चलने वाले सास बहू के कार्यक्रम कम देखे गए क्योंकि महिलाओं को भी ख़बरों में सीरियल वाला तड़का मिल ही रहा था.... इसके बाद 4 अप्रैल 2011 को रामलीला मैदान पर ही हमें सुनने को मिला कि अन्ना नहीं ये आंधी है देश का दूसरा गांधी है,साथ ही साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आधुनिक नाम वाली संस्था इंडिया अगेंस्ट करप्शन का उदय हुआ....देश के दिल दिल्ली में लोगों ने इस आंदोलन का दिल खोलकर समर्थन किया....अरेंजमेंट और ब्रांडिंग से ऐसा लग रहा था जैसे किसी बड़ी विज्ञापन कम्पनी ने इवेंट ऑर्गेनाइज किया है और यह आधुनिक तरह का आंदोलन लोगों में काफी लोकप्रिय भी हो रहा था क्योंकि इस तरह के आंदोलन या फिर कहें इवेंट आर्गेनाईजेशन की डिमांड भारतीय जनता में बहुत दिनों से थी.... अन्ना हज़ारे जो कि अपने अनशनों के लिए अभी तक सिर्फ महाराष्ट्र में जाने जाते थे अब पूरे देश में लोकप्रिय हो गए....उनके साथ-साथ ऐसे लोगों को भी लोकप्रियता प्राप्त हुई जिनको महज़ कुछ जिलों या बहुत कम संख्या में लोग जानते थे....अन्ना इस आंदोलन का मुख्य चेहरा थे और बाकी सभी बराबरी के भागीदार....अन्ना का आंदोलन पूरे रोमांच पर था और टीवी चैनल्स को बेहतरीन टी० आर० पी० मिल रही थी....जो दिखेगा वो बिकेगा अब पुरानी कहावत हो चली थी, अब जो बिकेगा वो ही दिखेगा जैसी नई कहावतें बन रही थी....राजनीति,देशभक्ति और मीडिया के इस उत्साही माहौल में एक अप्रत्याशित मोड़ आया और अचानक लोगों को पता चला कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए आंदोलन काफी नहीं है....इसके लिए राजनीतिक पार्टी बनानी होगी....बड़ी खींचतान के बाद आंदोलन ख़त्म हुआ और अन्ना की लोकप्रियता का वर्चस्व अब अरविन्द केजरीवाल को ट्रांसफर हो चुका था....आम लोगों का तो पता नहीं पर अपने आपको आम आदमी कहने वाले कुछ लोगों का भला ज़रूर हो गया....इन भले आम आदमियों ने मिलकर आम आदमी पार्टी का गठन किया ....जब चुनाव के परिणाम आये तो इस पार्टी के पास बहुमत नहीं था,बहुमत तो दूर की बात थी यह सबसे बड़ी पार्टी भी नहीं थी.... फिर इस नयी पार्टी ने उन्ही के समर्थन से सरकार बनाई जिनका विरोध करके वो जीत कर आये थे और अपनी इस बात को सही साबित करने लिए उन्होंने चासनी में डूबी बड़ी खूबसूरत दलीलें दी....वह बात अलग है इस सरकार के 49 दिन के मीडिया ट्रायल के बाद  आधुनिक पार्टी का सत्ता से मोह भंग हो गया ....लेकिन इस आधुनिक पार्टी का एक छोटे विकसित राज्य की सत्ता से मोह भंग होने का कारण पूरे देश में होने वाले लोकसभा के चुनावों का बड़े स्तर का मोह था,उन्हें उम्मीद थी क्या पता दिल्ली में फैली उनकी माया पूरे देश में चल जाये....खैर सत्ता के रंगमंच पर मोह और माया के इस दौर में 2014 के ऐतिहासिक लोकसभा के चुनाव में नरेंद्र मोदी जी ने कांग्रेस के खिलाफ बने विरोध के माहौल की कमान संभाली और आरोपों की एक लम्बी फेहरिस्त बना डाली.... व्यापकता के मामले में भाजपा, आम आदमी पार्टी से बड़ी पार्टी थी और लोकप्रियता के मामले में नरेंद्र मोदी अरविन्द केजरीवाल से कहीं बड़े नेता....आरोप प्रत्यारोप का खूब दौर चला कांग्रेस ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी....लेकिन आरोप लगाने का सबसे बड़ा लाभ नरेंद्र मोदी को मिला.... जितना ऊँचा कद उतना बड़ा लाभ....कांग्रेस पार्टी चारो खाने चित थी और चारों तरफ सिर्फ मोदी जी छा गए इसके साथ ही  शुरू हो गया मन की बात, सेल्फ़ियों और विदेश यात्राओं का दौर....आधुनिक पार्टी के सबसे बड़े नेता भी भारी अंतर से लोकसभा चुनाव हार गए असल में उनके लगाये गए आरोपों को देश स्तर पर नकार दिया गया या यूँ कहें मोदी जी के आरोपों पर लोगों ने भरोसा कर लिया....खैर आधुनिक पार्टी को यह अहसास हुआ कि उनके आरोप एक विकसित प्रदेश की सीमाओं तक सीमित है....तुरंत ही वह अपने दायरे में आये और फिर से जम कर आरोप लगाये परिणामस्वरूप दिल्ली राज्य में पूर्ण बहुमत से इस आधुनिक पार्टी की सरकार बन गयी....लेकिन भारतीय राजनीति की विडंबना इस बात की है कि जिन आरोपों को लगाकर और उनको दुरुस्त करने की बात करके लोग प्रदेश या देश की सत्ता में आये,वही महान लोग अभी तक उन्ही आरोपों का समाधान नहीं खोज पाये और हद तो तब हो गई जब उन्होंने समाधान न मिल पाने के लिए विरोधियों पर ही आरोप लगा दिया....जनता अभी भी रोजाना के भ्रष्टाचार ,अपराध और मूलभूत आवश्यकताओं की कमी से जूझ रही है और नेतृत्व करने वाले लोग एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं....यह विडम्बना भारतीय राजनीति में आज की नहीं है अपितु कई दशकों से चली आ रही है....तक़रीबन 28 साल पहले बोफोर्स घोटाला देश में उजागर होने वाला बहुत बड़ा घोटाला था....इस घोटाले के उजागर होने से कई साफ सुथरी छवि वाली हस्तियों के दामन पर दाग लग गए थे और इन नामचीन हस्तियों के पुश्त दर पुश्त चले आ रहे संबंधों में दरार आ गयी....गांधी और बच्चन परिवार के सम्बन्ध इस बात के प्रमुख उदाहरण  है....लेकिन इस मुद्दे का सबसे लाभदायक प्रयोग पूर्व प्रधानमंत्री वी० पी० सिंह ने आरोप लगाने के लिए किया....यह 1988 -89 का दौर था जब वी० पी० सिंह कांग्रेस पार्टी से अलग हो चुके थे और अब वह कांग्रेस के प्रमुख विरोधी थे.... वी पी सिंह चुनावी सभाओं में जब भाषण देते तो जेब से एक कागज निकालते और कहते सभी घोटालेबाजों के नाम इस पर्ची में है जैसे ही वह सत्ता में आएंगे इन लोगों को जेल भेज देंगें....आरोपों की महिमा के क्या कहने  वी० पी० सिंह जी की तरक्की हुई देश के वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री रह चुके वी० पी० सिंह अब देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे,हालाँकि न घोटाले बंद हुए न भ्रष्टाचार....इस देश की जनता का दुर्भाग्य यह है कि हर दशक में वह किसी बड़े नेता पर भरोसा करती है और फिर कोई सकारात्मक परिणाम की जगह मिलते है सिर्फ बहाने ,आरोप - प्रत्यारोप और समस्याएं को दुरुस्त करने के आश्वासन,तो फिर क्या यह सिर्फ चुनावों का माहौल और सत्ता प्राप्त करने उत्साह होता है कि लोग जनता को यह यकीन दिलाते हैं कि अगर वह सत्ता में आये तो सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा और सत्ता में आने के बाद उनको और समय चाहिए,या फिर विरोधी उन्हें यह काम करने नहीं दे रहे....भोली जनता यह समझ नहीं पाती कि ठीक चुनावों से पहले हर समस्या को सुलझाने  में सक्षम लगने वाले नेता सत्ता मिलते ही समस्याओं से निपटने में अक्षम कैसे हो जाते हैं....चुनावों से पहले किसी बड़े बजट की फंतासी  फिल्म के सुपर हीरो जैसे लगने वाले नेता सत्ता मिल जाने के बाद किसी कम बजट की कला फिल्म के चरित्र कलाकार जैसे कैसे हो जाते हैं....राजनीती के आसमान में गरजने वाले ये विशालकाय बादल रुपी बड़े नेता कभी वाकई में बरस जाएँ,सिर्फ मन की बातें ,आम आदमी की बातें या आरोपों की बौछार करने की जगह कुछ काम जमीनी स्तर पर कर दें तो बरसों से आम जनता और खास तौर से हिंदुस्तान की गरीब और पिछड़ी हुई जनता के जीवन में जो अभावों का सूखा है उसमें  कुछ राहत तो मिल ही जाएगी....चलिए राहत नहीं जनता के जीवन में लोगों की रूहों तक को कपकपां देने वाला महंगाई का जो बेरहम मौसम है उसके जुल्मों में कुछ कमी तो आ ही जाये.... देश के आम लोगों की ज़रूरते भी उन्ही की तरह आम ही हैं बहुत खास नहीं है....कभी उत्तर भारत के किसी कस्बे में दो दिन गुजार कर देखिये अगर लाइट सोलह घंटे आ जाती है तो लोगों के चेहरे रोशन हो जाते और ऐसी अवस्था में स्वादिष्ट भोजन के मिलने के चान्स बढ़ जाते हैं क्योंकि अमूमन भारत के छोटे शहरों और गांवों में गृहणियों की यह बड़ी समस्या है....ऐसे ही कई छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान अगर जनता को मिल जाये तो वह संतुष्ट है....ऐसा भी नहीं है कि गत सरकारों या वर्तमान सरकार ने काम नहीं किया लेकिन राजनेता सत्ता केंद्रित हैं और आम लोगों को लाभ पहुचने के बजाय उनका कीमती समय आरोप -प्रत्यारोप में बीत रहा है....खैर राजनीति के सभी घटनाक्रमों में खास बात यह निकल कर आई कि आरोप लगाने के बाद चुनाव में जीतने की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं....लेकिन विश्व के बड़े लोकतान्त्रिक देशों में से एक महत्वपूर्ण देश भारत की आम जनता क्या करे? जहाँ का संविधान जिसे सबसे ताकतवर मानता है वही सबसे कमज़ोर है और जनता की सेवा करने के नाम पर बने जनसेवक सबसे ताकतवर....आरोप -प्रत्यारोप का दौर जारी है और देश की समस्याएं जैसी थी वैसी बनी हुई हैं....उम्मीद है राजनेताओं का हाथ गरीब के साथ होगा और आम आदमियों के लिए अच्छे दिन आयेंगें.... पाठकों के मन में निराशा न आये और आत्मविश्वास  बना रहे इसलिए इस लेख को एक उम्मीद भरे गीत की लाइन से सजा रहा हूँ....मन में है विश्वास पूरा है विश्वास हम होंगें कामयाब एक दिन....जय हिन्द (लेखक प्रवीण साहनी समाचार प्लस के कार्यकारी संपादक हैं)

फ़टाफ़ट खबरे

 

live-tv-uttrakhand

live-tv-rajasthan

ब्लॉग

लीडर

  • उमेश कुमार

    एडिटर-इन-चीफ,समाचार प्लस

    उमेश कुमार समाचार प्लस के एडिटर इन चीफ हैं।

  • प्रवीण साहनी

    एक्जक्यूटिव एडिटर

    प्रवीण साहनी पत्रकारिता जगत का जाना-माना नाम और चेहर...

आपका शहर आपकी खबर

वीडियो

हमारे एंकर्स

शो

:
:
: