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जाट आंदोलन ने फिर से ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या आंदोलन का मतलब गुंडागिरी है। इसके पहले गुजरात के पटेल आंदोलन के समय भी इस सवाल ने सिर उठाया था मगर लोगों ने ध्यान नहीं दिया। इसी पटेल आंदोलन को फोकस कर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि गुजरात में पटेल आंदोलन के दौरान जो नुकसान हुआ, उसका मुआवजा नुकसान पहुंचाने वालों से लिया जाना चाहिए। जाट आंदोलन में फिर से वही सब कुछ बल्कि उससे भी बढ़कर हुआ जिसकी उम्मीद तो दूर इस देश के सभ्य समाज में उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

इसमें कोई दो राय नहीं कि आंदोलन का मकसद लोगों की सोच औऱ विचार को बदलना होता है लेकिन जाट आंदोलन जैसे आंदोलनों के मायने क्या हैं इसका जवाब अभी बाकी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंसक आंदोलन ना केवल लोगों को चौंकाते हैं बल्कि मीडिया में भी ऐसे आंदोलन को जगह ज्यादा मिलती है। लेकिन ये भी सच है कि केवल अहिंसक आंदोलनों को ही कामयाबी मिलती रही है। हिंसक आंदोलनों से थोड़ा बहुत जो बदलाव आता भी है वो टिकाऊ नहीं होता। जाट आंदोलन को ही लीजिए आज जिस तरह इस आंदोलन पर सवाल उठने लगे वो किसी भी आंदोलनकारी को सकून देने वाला नहीं हो सकता। देश के आंदोलन इतिहास में जाट आंदोलन को सबसे अराजक हिंसक आंदोलन के रूप में जाना जाने लगा है। सच भी है 40 हजार करोड़ रूपये का नुकसान जिस आंदोलन से हो उसे जायज कैसे ठहराया जा सकता है। पिछले साल गुजरात में पटेल आंदोलन में भी काफी नुकसान हुआ। 15 दिनों तक पूरे गुजरात में हालात तनावपूर्ण रहे। तेलांगना औऱ झारखंड जैसे राज्यों में भी आंदोलन हुए औऱ रिपोर्टों के मुताबिक तो तेलांगना बनने में करीब 1 लाख करोड़ का नुकसान हुआ इतने पैसों में तेलांगना का काफी विकास हो सकता था। पश्चिम बंगाल में हुए सिंगूर आंदोलन में 75 हजार करोड़ का नुकसान हुआ था।

दूसरी तरफ कुछ आंदोलन ऐसे भी हैं जो अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहे और उनका असर भी काफी बड़ा औऱ व्यापक रहा। अन्ना आंदोलन को ही लीजिए मौजूदा समय के बड़े आंदोलनों में से एक अन्ना आंदोलन इतना फैला कि पूरे देश में भ्रष्टाचार को लेकर नई बहस शुरू हो गई। पहली बार किसी बिल को बनाने के लिए सिविल सोसायटी के लोगों को मिलाकर एक कमेटी बनाई गई। निर्भया आंदोलन ने महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए देश में सख्त कानून बनवा दिया। एक आनलाइन आंदोनल तो इतना प्रभावी हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल आईटीएक्ट की धारा 66ए को ही रद्द कर दिया। आरटीआई एक्ट भी अहिंसक आंदोलन का ही परिणाम है।

वर्तमान समय में जन आंदोलन की परिभाषा दिशा और दशा दोनों बदल गई है समय के साथ होने वाला स्वाभाविक परिवर्तन तो ठीक है मगर जब आंदोलन का आधार ही परिवर्तित हो जाए तो दो देश औऱ आंदोलन दोनों के लिए ही जाट आंदोलन जैसा छाप ही छोड़ पाता है इसका कोई नतीजा निकलता नहीं।

 

(लेखक आलोक वर्मा समाचार प्लस के एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं)

 

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