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एक बड़ी प्रचलित कहावत है कि एक अच्छी शुरुआत आधी सफलता की निशानी है लेकिन मैंने राजनीति का अध्ययन करने से पाया कि किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना सफलता की आधी निशानी है या कभी-कभी पूरी राजनीतिक सफलता सिर्फ जोर शोर से लगाये गए आरोपों पर निर्भर करती है....वर्ष 2014 में 16वीं लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस के खिलाफ जोरों का माहौल था, अब यह घोटालों की सरकार थी, महंगाई बढ़ाने वाली सरकार या फिर मूक और कमजोर प्रधानमंत्री की सरकार अथवा हर मोर्चे पर विफल सरकार (ये मनमोहन सरकार पर लगाये गए तत्कालीन आरोप हैं)....लेकिन परिणाम भाजपा की ऐतिहासिक जीत के रूप में सामने आया....हालाँकि कांग्रेस सरकार के पतन की नींव 27 फरवरी 2011 में रख दी गयी थी जब कांग्रेस के खिलाफ बाबा रामदेव ने आरोपों का बिगुल फूंका ,जिससे देश भर में एक लहर उठ गयी....इस उत्साही लहर के उठने के कई कारण हो सकते हैं, योग्य विश्लेषक उसका विश्लेषण कर सकते हैं ,लेकिन मेरे व्यक्तिगत विश्लेषण से यह बात समझ में आती है कि मीडिया चैनलों को रामलीला मैदान पर ख़बरों के लिए रोमांचक माहौल मिला और साथ ही साथ मीडिया जगत की बड़ी हस्तियों ने इस घटनाक्रम को बड़े जोश -खरोश से कवर किया....अब यह जनता की भावनाओं का उबाल था या बाबा रामदेव के शिष्यों की भक्ति, जो भी हो लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचे....बाबा जी ने उद्घोष किया कि विदेश में भारी मात्रा में कालाधन जमा है और जिसकी जिम्मेदार कांग्रेस सरकार है....इतना ही नहीं उन्होंने अंकगणित के प्रयोग के माध्यम से यह भी बताया कि अगर विदेशों में छुपा काला धन वापस आ जाये तो पूरे भारत की गरीबी मिट सकती है....आम जीवन के संघर्षों से रोजाना दो चार होती आम जनता को यह बात बड़ी राहत देने वाली लगी और राहत लगे भी क्यों न,सुनने में तो अच्छा लगता ही है, काले धन की वापसी और देश से गरीबी की समाप्ति....बाबा रामदेव काला धन वापस ला पाते और देश की समस्याएं सुलझा पाते कि इससे पहले रामलीला मैदान पर दिल्ली पुलिस जा पहुंची और आनन फानन में बाबा रामदेव जी को वहां से भागना पड़ा....भागते वक़्त उन्होंने किसके कपड़े पहन रखे थे यह महत्वपूर्ण विषय नहीं है.... वह बात अलग है कि इस मुद्दे पर भी टीवी चैनलों पर काफी रोमांचित करने वाली बहस चली.... इन दिनों घरों में दिन भर चलने वाले सास बहू के कार्यक्रम कम देखे गए क्योंकि महिलाओं को भी ख़बरों में सीरियल वाला तड़का मिल ही रहा था.... इसके बाद 4 अप्रैल 2011 को रामलीला मैदान पर ही हमें सुनने को मिला कि अन्ना नहीं ये आंधी है देश का दूसरा गांधी है,साथ ही साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आधुनिक नाम वाली संस्था इंडिया अगेंस्ट करप्शन का उदय हुआ....देश के दिल दिल्ली में लोगों ने इस आंदोलन का दिल खोलकर समर्थन किया....अरेंजमेंट और ब्रांडिंग से ऐसा लग रहा था जैसे किसी बड़ी विज्ञापन कम्पनी ने इवेंट ऑर्गेनाइज किया है और यह आधुनिक तरह का आंदोलन लोगों में काफी लोकप्रिय भी हो रहा था क्योंकि इस तरह के आंदोलन या फिर कहें इवेंट आर्गेनाईजेशन की डिमांड भारतीय जनता में बहुत दिनों से थी.... अन्ना हज़ारे जो कि अपने अनशनों के लिए अभी तक सिर्फ महाराष्ट्र में जाने जाते थे अब पूरे देश में लोकप्रिय हो गए....उनके साथ-साथ ऐसे लोगों को भी लोकप्रियता प्राप्त हुई जिनको महज़ कुछ जिलों या बहुत कम संख्या में लोग जानते थे....अन्ना इस आंदोलन का मुख्य चेहरा थे और बाकी सभी बराबरी के भागीदार....अन्ना का आंदोलन पूरे रोमांच पर था और टीवी चैनल्स को बेहतरीन टी० आर० पी० मिल रही थी....जो दिखेगा वो बिकेगा अब पुरानी कहावत हो चली थी, अब जो बिकेगा वो ही दिखेगा जैसी नई कहावतें बन रही थी....राजनीति,देशभक्ति और मीडिया के इस उत्साही माहौल में एक अप्रत्याशित मोड़ आया और अचानक लोगों को पता चला कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए आंदोलन काफी नहीं है....इसके लिए राजनीतिक पार्टी बनानी होगी....बड़ी खींचतान के बाद आंदोलन ख़त्म हुआ और अन्ना की लोकप्रियता का वर्चस्व अब अरविन्द केजरीवाल को ट्रांसफर हो चुका था....आम लोगों का तो पता नहीं पर अपने आपको आम आदमी कहने वाले कुछ लोगों का भला ज़रूर हो गया....इन भले आम आदमियों ने मिलकर आम आदमी पार्टी का गठन किया ....जब चुनाव के परिणाम आये तो इस पार्टी के पास बहुमत नहीं था,बहुमत तो दूर की बात थी यह सबसे बड़ी पार्टी भी नहीं थी.... फिर इस नयी पार्टी ने उन्ही के समर्थन से सरकार बनाई जिनका विरोध करके वो जीत कर आये थे और अपनी इस बात को सही साबित करने लिए उन्होंने चासनी में डूबी बड़ी खूबसूरत दलीलें दी....वह बात अलग है इस सरकार के 49 दिन के मीडिया ट्रायल के बाद  आधुनिक पार्टी का सत्ता से मोह भंग हो गया ....लेकिन इस आधुनिक पार्टी का एक छोटे विकसित राज्य की सत्ता से मोह भंग होने का कारण पूरे देश में होने वाले लोकसभा के चुनावों का बड़े स्तर का मोह था,उन्हें उम्मीद थी क्या पता दिल्ली में फैली उनकी माया पूरे देश में चल जाये....खैर सत्ता के रंगमंच पर मोह और माया के इस दौर में 2014 के ऐतिहासिक लोकसभा के चुनाव में नरेंद्र मोदी जी ने कांग्रेस के खिलाफ बने विरोध के माहौल की कमान संभाली और आरोपों की एक लम्बी फेहरिस्त बना डाली.... व्यापकता के मामले में भाजपा, आम आदमी पार्टी से बड़ी पार्टी थी और लोकप्रियता के मामले में नरेंद्र मोदी अरविन्द केजरीवाल से कहीं बड़े नेता....आरोप प्रत्यारोप का खूब दौर चला कांग्रेस ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी....लेकिन आरोप लगाने का सबसे बड़ा लाभ नरेंद्र मोदी को मिला.... जितना ऊँचा कद उतना बड़ा लाभ....कांग्रेस पार्टी चारो खाने चित थी और चारों तरफ सिर्फ मोदी जी छा गए इसके साथ ही  शुरू हो गया मन की बात, सेल्फ़ियों और विदेश यात्राओं का दौर....आधुनिक पार्टी के सबसे बड़े नेता भी भारी अंतर से लोकसभा चुनाव हार गए असल में उनके लगाये गए आरोपों को देश स्तर पर नकार दिया गया या यूँ कहें मोदी जी के आरोपों पर लोगों ने भरोसा कर लिया....खैर आधुनिक पार्टी को यह अहसास हुआ कि उनके आरोप एक विकसित प्रदेश की सीमाओं तक सीमित है....तुरंत ही वह अपने दायरे में आये और फिर से जम कर आरोप लगाये परिणामस्वरूप दिल्ली राज्य में पूर्ण बहुमत से इस आधुनिक पार्टी की सरकार बन गयी....लेकिन भारतीय राजनीति की विडंबना इस बात की है कि जिन आरोपों को लगाकर और उनको दुरुस्त करने की बात करके लोग प्रदेश या देश की सत्ता में आये,वही महान लोग अभी तक उन्ही आरोपों का समाधान नहीं खोज पाये और हद तो तब हो गई जब उन्होंने समाधान न मिल पाने के लिए विरोधियों पर ही आरोप लगा दिया....जनता अभी भी रोजाना के भ्रष्टाचार ,अपराध और मूलभूत आवश्यकताओं की कमी से जूझ रही है और नेतृत्व करने वाले लोग एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं....यह विडम्बना भारतीय राजनीति में आज की नहीं है अपितु कई दशकों से चली आ रही है....तक़रीबन 28 साल पहले बोफोर्स घोटाला देश में उजागर होने वाला बहुत बड़ा घोटाला था....इस घोटाले के उजागर होने से कई साफ सुथरी छवि वाली हस्तियों के दामन पर दाग लग गए थे और इन नामचीन हस्तियों के पुश्त दर पुश्त चले आ रहे संबंधों में दरार आ गयी....गांधी और बच्चन परिवार के सम्बन्ध इस बात के प्रमुख उदाहरण  है....लेकिन इस मुद्दे का सबसे लाभदायक प्रयोग पूर्व प्रधानमंत्री वी० पी० सिंह ने आरोप लगाने के लिए किया....यह 1988 -89 का दौर था जब वी० पी० सिंह कांग्रेस पार्टी से अलग हो चुके थे और अब वह कांग्रेस के प्रमुख विरोधी थे.... वी पी सिंह चुनावी सभाओं में जब भाषण देते तो जेब से एक कागज निकालते और कहते सभी घोटालेबाजों के नाम इस पर्ची में है जैसे ही वह सत्ता में आएंगे इन लोगों को जेल भेज देंगें....आरोपों की महिमा के क्या कहने  वी० पी० सिंह जी की तरक्की हुई देश के वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री रह चुके वी० पी० सिंह अब देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे,हालाँकि न घोटाले बंद हुए न भ्रष्टाचार....इस देश की जनता का दुर्भाग्य यह है कि हर दशक में वह किसी बड़े नेता पर भरोसा करती है और फिर कोई सकारात्मक परिणाम की जगह मिलते है सिर्फ बहाने ,आरोप - प्रत्यारोप और समस्याएं को दुरुस्त करने के आश्वासन,तो फिर क्या यह सिर्फ चुनावों का माहौल और सत्ता प्राप्त करने उत्साह होता है कि लोग जनता को यह यकीन दिलाते हैं कि अगर वह सत्ता में आये तो सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा और सत्ता में आने के बाद उनको और समय चाहिए,या फिर विरोधी उन्हें यह काम करने नहीं दे रहे....भोली जनता यह समझ नहीं पाती कि ठीक चुनावों से पहले हर समस्या को सुलझाने  में सक्षम लगने वाले नेता सत्ता मिलते ही समस्याओं से निपटने में अक्षम कैसे हो जाते हैं....चुनावों से पहले किसी बड़े बजट की फंतासी  फिल्म के सुपर हीरो जैसे लगने वाले नेता सत्ता मिल जाने के बाद किसी कम बजट की कला फिल्म के चरित्र कलाकार जैसे कैसे हो जाते हैं....राजनीती के आसमान में गरजने वाले ये विशालकाय बादल रुपी बड़े नेता कभी वाकई में बरस जाएँ,सिर्फ मन की बातें ,आम आदमी की बातें या आरोपों की बौछार करने की जगह कुछ काम जमीनी स्तर पर कर दें तो बरसों से आम जनता और खास तौर से हिंदुस्तान की गरीब और पिछड़ी हुई जनता के जीवन में जो अभावों का सूखा है उसमें  कुछ राहत तो मिल ही जाएगी....चलिए राहत नहीं जनता के जीवन में लोगों की रूहों तक को कपकपां देने वाला महंगाई का जो बेरहम मौसम है उसके जुल्मों में कुछ कमी तो आ ही जाये.... देश के आम लोगों की ज़रूरते भी उन्ही की तरह आम ही हैं बहुत खास नहीं है....कभी उत्तर भारत के किसी कस्बे में दो दिन गुजार कर देखिये अगर लाइट सोलह घंटे आ जाती है तो लोगों के चेहरे रोशन हो जाते और ऐसी अवस्था में स्वादिष्ट भोजन के मिलने के चान्स बढ़ जाते हैं क्योंकि अमूमन भारत के छोटे शहरों और गांवों में गृहणियों की यह बड़ी समस्या है....ऐसे ही कई छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान अगर जनता को मिल जाये तो वह संतुष्ट है....ऐसा भी नहीं है कि गत सरकारों या वर्तमान सरकार ने काम नहीं किया लेकिन राजनेता सत्ता केंद्रित हैं और आम लोगों को लाभ पहुचने के बजाय उनका कीमती समय आरोप -प्रत्यारोप में बीत रहा है....खैर राजनीति के सभी घटनाक्रमों में खास बात यह निकल कर आई कि आरोप लगाने के बाद चुनाव में जीतने की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं....लेकिन विश्व के बड़े लोकतान्त्रिक देशों में से एक महत्वपूर्ण देश भारत की आम जनता क्या करे? जहाँ का संविधान जिसे सबसे ताकतवर मानता है वही सबसे कमज़ोर है और जनता की सेवा करने के नाम पर बने जनसेवक सबसे ताकतवर....आरोप -प्रत्यारोप का दौर जारी है और देश की समस्याएं जैसी थी वैसी बनी हुई हैं....उम्मीद है राजनेताओं का हाथ गरीब के साथ होगा और आम आदमियों के लिए अच्छे दिन आयेंगें.... पाठकों के मन में निराशा न आये और आत्मविश्वास  बना रहे इसलिए इस लेख को एक उम्मीद भरे गीत की लाइन से सजा रहा हूँ....मन में है विश्वास पूरा है विश्वास हम होंगें कामयाब एक दिन....जय हिन्द (लेखक प्रवीण साहनी समाचार प्लस के कार्यकारी संपादक हैं)

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