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यूपी की राजनीति का देश की राजनीति में विशेष महत्व है स्वभाविक है कि यूपी विधान सभा के आने वाले चुनाव भी बहुत अहमियत रखते हैं।

लेकिन पिछले दो साल से चुनाव आने के पहले से ही जिस व्याकुलता से राजनीतिक दल बदजुबानी की बिसात बिछाने में जुटते हैं उससे ये चुनाव भी अछूता नहीं रहने वाला। आगाज हो चुका है और अंजाम कि परवाह नहीं सिर्फ जीत की परवाह है।

चुनावी जंग में अगर सिद्धांतों की बात की जाए तो यह सिरे से ही एक जुमला कहा जाएगा क्योंकि इसका मकसद सिर्फ ये होता है कि जीत किस प्रकार हासिल की जाए। जब देश के सबसे बड़े आबादी वाले प्रदेश में चुनावी बिसात की बात आती है तो ये और भी दिलचस्प हो जाता है।

अब तक सपा और बसपा के जुबानी जंग की बात की जाती थी लेकिन इस बार चुनाव से पहले दयाशंकर सहित अन्य नेताओं ने भी बदजुबानी की प्रतियोगिता में बढ़चढ़ कर शामिल होने की ठान रखी है।

कई नेता इसी की तैयारी कर रहे होंगे तो कईयों के लिए ये उनके स्वभाविक आदत है। सपा और बसपा में पिछले कई दशक से हाई कमांड संस्क़ृति समान रूप से लागू है। मगर कांग्रेस भाजपा भी इस बार पीछे हटती हुई नहीं दिखाई दे रहीं।

सार्वजनिक लोग बदजुबानी क्यों करते हैं इस सवाल का जवाब बड़ा सीधा है कि मीडिया इनको तवज्जो देता है। डिबेट होता है प्रतिक्रियाएं होती हैं और आम दिनों में स्क्रीन पर कभी ना दिखने वाले नेताओं की दुकान चल पड़ती है।

जाहिर है, मीडिया में छाने और वोटरों को बरगलाने की तैयारियां हर स्तर पर चल रही हैं। यूपी का चुनावी समीकरण अभी बेशक उलझा हुआ हो। किंतु इतना तो निश्चित ही लग रहा है कि मुख्य रूप से सपा, बसपा औऱ भाजपा ही मुख्य लड़ाई में रहने वाले हैं। कांग्रेस सहित दूसरे दलों की स्थिति का भा पता चल जाएगा। मगर इस समय दिखने वाले तीनों चुनावी महारथी यानि कि सपा बसपा और भाजपा अपने अपने रिजर्व वोट का दावा करते हैं मगर अंदर ही अंदर समीकरण को दुरूस्त करने की कवायद भी करते रहते हैं। जाहिर है कि राजनीतिक दलों के लिए वोटर-समीकरण को अपने पक्ष में करने का सबसे आसान तरीका बदजुबानी दिखती है।

लेकिन 2017 के चुनावी समर में उतरने के लिए बदजुबानी के तलवार की धार तेज कर रहे नेताओं को 2014 के आम चुनाव को याद करना चाहिए जब लगभग सारे नेताओं ने अपनी गरिमा पूरी तरह खो दी थी।

नेताओं ने एक दूसरे की अत्यंत निजी क्षणों को तलाश करने में पसीना बहाया था लेकिन देश के वोटरों ने देश के दिन बदलने और विकास की रफ्तार पर ले जाने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी और गैर पेशेवर राजनीति के प्रतीक के रूप में खुद को स्थापित करने की कोशिश करने वाले अरविंद केजरीवाल को सिर-आंखों पर बिठाया था।

बावजूद इसके एक साल बीतते बीतते सारे दलों के नेता इस सबक को भूल गए और 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में बदजुबानी की सारी हदें पार कर दीं। बिहार विधानसभा के चुनाव में ऐसी कोई सभा नहीं हुई जिसे संबोधित करने वाले नेताओं ने हदें ना पार की हों। चुनाव आयोग के दखल पर कई मुकदमे भी दर्ज हुए मगर ना तो उसका असर नेताओं पर पड़ा और ना ही चुनाव बाद इन मुकदमों को कोई याद रखता है।

2014 के आम चुनाव और 2015 के विधानसभा के चुनावी समर में उतरे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपनी बदजुबानी से लोकतंत्र को दागदार किया। करोड़ो रूपये बहाने का साथ साथ जुबान भी बेलगाम हो गए। 

इस बार भी आगाज कुछ अच्छा नहीं है बदजुबानी के लिए फोकस में रहने वाले नेता तैयारी कर रहे होंगे। लेकिन ऐसे नेताओं को बदजुबानी का शब्दकोष भरते समय 2014-2015 के चुनाव नतीजों को याद रखना होगा।

(लेखक आलोक वर्मा समाचार प्लस के एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं)
 

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