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गाजियाबाद. यूं ही नहीं कहते पैसा बोलता है और जब पैसा बोलता है तो बाकी सब के मुंह पर ताले लग जाते हैं सिवाय पैसे वाले के... और सियासत में तो नोटों की थैली से कुर्सी तौली जाती है या कहें गड्डियों के दम पर कुर्सी छीन भी ली जाती है। हालांकि इस कबूलनामा कम ही होता है लेकिन हम आपको खरीद-फरोख्त का खुला कबूलनामा दिखाएंगे। जहां सत्ताधारियों के संरक्षण में कुर्सी पैसे वालों की गुलाम हो गई और जनता मात्र मूकदर्शक... क्योंकि उसके वोट का तो ऊपर ही ऊपर सौदा हो गया। सियासत में सेवा और समर्पण तो बस किताबी बात हो गई और अब तो राजनीति कॉर्पोरेट कारोबार की जगह ले चुकी है।यही वजह है कि जो चुनाव जनाधार से लड़ा जाता था। अब नोटों की बौछार से लड़ा जाता है। ये बात हम नहीं खुद हुक्मरान अपने हलक से स्वीकारते हैं। वो भी खुले मंच से। पैसों के दम पर चुनाव लड़ना अब ऐब नहीं है ये तो इनके लिए शान का सम्मान का प्रतीक है। जैसे इन्होंने बड़ी जंग जीत ली हो,.. अपनी तिजौरियों के दम पर..

 

बीजेपी नेता ने खुद कबूल की बात 

 -दरअसल, ये मसला गाजियाबाद के जिला पंचायत अध्यक्ष उपचुनाव से जुड़ा है। जहां से बीजेपी नेता पवन मावी की पत्नी लक्ष्मी मावी निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष चुन ली गईं।

-इस जीत के साथ जब पवन मावी दल बल, पार्टी कार्यकर्ताओं और अपने समर्थकों के साथ अपने आवास लोनी पंहुचे तो वहां जश्न का माहौल था।

-इसी जोश में पूर्व जिलापंचायक और बीजेपी नेता बबली कसाना ने ऐसा कबूलनामा किया कि सब सन्न रह गए।

-बबली कसाना ने पैसे बांटने की बात गर्व से लोनी से बीजेपी विधायक नंद किशोर गुर्जर और जिला पंचायत अध्यक्ष लक्ष्मी मावी पति पवन मावी की मौजूदगी में कही। 

 

-अब इस चुनाव के पीछे की कड़ियों से भी आपको जोड़ते हैं... 

- सपा सरकार के दौरान गाजियाबाद जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी सपा नेता आशु मलिक के भाई नूर हसन मलिक के पास थी।

-सूबे की सत्ता पर सियासी समीकरण बदले तो गाजियाबाद में भी नूर हसन मलिक के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया और ये अविश्वास प्रस्ताव लाए थे जिला पंचायत सदस्य अनिल कसाना। कसाना सपा सरकार के दौरान सपाई थे और सत्ता बदली तो भाजपाई हो गए। यही हाल पवन मावी का था वो भी सपा छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए।

-कांग्रेस में भी रहे....यानि सत्ता के साथ ही इन्हें चैन आता है। दोनों की ही कोशिश जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पाने की थी।

-इसी खींचतान के बाद बीजेपी ने किसी को भी अपना सिंबल देने से इंकार कर दिया। हालांकि पवन मावी का खेमा धन बल और बाहुबल में ज्यादा मजबूत था। असर ये हुआ कि उनकी पत्नी लक्ष्मी मावी ने पर्चा भर दिया और दूसरी तरफ नामांकन फॉर्म लेने के बाद भी बीजेपी के अनिल कसाना ने फॉर्म जमा नहीं किया। यानि लक्ष्मी मावी का रास्ता साफ हो गया।

-बता दें कि अनिल कसाना को बीजेपी के कई विधायकों को समर्थन था। जिनमें अजितपाल त्यागी, मंजू सिवाच और सुनील शर्मा जैसे नाम शामिल हैं।

-इस बात का इशारा बबली कसाना ने भी पैसों का दम दिखाते वक्त किया था और कहा था कि सब विपक्ष में थे पक्ष में कोई था ही नहीं.. लेकिन पैसों के दम पर सब हो गया। ज्यादा दिमाग पर जोर डाले बिना सब साफ समझ आ रहा है कि आखिर कैसे लक्ष्मी मावी निर्विरोध निर्वाचित हो गईं। तभी तो मंच से नोटों की ताकत बताई गई...

-बाहुबल और सत्ता का चुनाव कहा जाने जाने वाला जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव के लिए पवन मावी की पत्नी इकलौती पर्चा दाखिल करने वाली प्रत्याशी थी जिनके विरोध में किसी ने भी पर्चा दाखिल नहीं किया।

-इस तरह पर्चा दाखिला करने के साथ ही जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव वो जीत गयी और ये साबित कर दिया कि कैसे पैसे के दम पर चुनाव जीते जाते हैं।

पहचान- भगवा रंग के कुर्ते में बोलता बबली कसाना है, जो पूर्व जिला पंचायत सदस्य है। उसके लेफ्ट में भगवा कुर्ते में पवन मावी है जो ज़िला पंचायत चुनी गई लक्ष्मी मावी का पति है। दाहिने तरफ लंबा आदमी लोनी विधायक नंदकिशोर गुर्जर है।

 

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