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दिल्ली के विकासपुरी में सिर्फ रबड़ की गेंद लगने की वजह से एक होनहार डाक्टर को पीट पीट कर मार डाला गया। जी हां पीट पीट कर सिर्फ इसलिए क्योंकि डाॅक्टर अपने बच्चे के साथ क्रिकेट खेल रहे थे औऱ रबड़ की गेंद सड़क पर जा रही एक बाइकर को लग गई। बेरहम बेदर्द लोगों मेंडाॅक्टर को पीटते समय ना तो शर्म आई ना ही इंसानियत का तकाजा। दिल्ली, जिसके जगराते और लंगर देश भर में मशहूर हैं, अब गुस्से के लिए कुख्यात होने लगी है। आंकड़ों की मानें तो दिल्ली में हर चौथे दिन रोड रेज का मामला सामने आता है। लोग मामूली सी बात पर भड़कते हैं और फिर ये झगड़ा भयानक कत्ल का शक्ल अख्तियार कर लेता है।


दिल्ली के गुस्से को पहले आंकड़ों से ही समझते हैं जरा सोच के देखिए दिल्ली में हर साल होने वाले करीब 20 फीसदी कत्ल के पीछे मामूली बात पर भड़का गुस्सा होता है। हर साल दिल्ली में डेढ हजार लोग किसी ना किसी लापरवाह वाहन चालक का शिकार होकर अपनी जान गंवा देते हैं। आध्यात्म, योग और दूसरे लोग इसकी कई वजहे भी गिनाते हैं औऱ अपने अपने तरीके से इस पर काबू पाने के उपाय भी बताते या करते हैं मगर फिर भी दिल्ली का गुस्सा कम होने की बजाय दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है।

दूसरे को मौत के घाट उतार देना दिल्ली में फैशन बनता जा रहा है और इसका कोई सीधा औऱ ठोस उपाय लोगों की समझ में नहीं आ रहा। मामूली सी बात होती है गुस्सा भड़कता है औऱ फिर शुरू हो जाता है राक्षसी नाच जिसका अंत किसी की दर्दनाक मौत के साथ हो जाता है। मीडिया से लेकर पुलिस तक शोर करते हैं औऱ फिर सब कुछ सामान्य और फिर वही होड़ शुरू हो जाती है।

राजधानी दिल्ली में अच्छी सड़कें ओर शानदार गाडि़यों के बावजूद दिल्ली में ट्रैफिक व्यवस्था के खस्ता हाल लोगों के गुस्से का सबसे बड़ा कारण है। दिल्ली पुलिस के एक सर्वे से पता चला है कि 25 फीसद लोग गुस्से में ड्राइविंग करते हैं। दिल्ली पुलिस के सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि रोड रेज की ज्यादातर घटनाएं ड्राइवरों के साथ ही होती है। ड्राइवरों के ज्यादा गुस्से में रहने की वजय यह भी हो सकती है कि वो लगातार गाडि़यां चलाते रहते हैं और उनको आराम का समय कम मिलता है। सर्वे यह भी बताया है कि दिल्ली में 27 फीसद लोग लगातार हेडलाइट चमकाते हैं और 25 प्रतिशत लगातार हॉर्न बजाते हैं।

क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के 21 फीसद घरों में कम से कम एक कार मौजूद है तो वहीं 30 प्रतिशत घरों में कम से कम एक दोपहिया वाहन है। दिल्ली में औसतन एक आदमी रोजाना 10.4 किलोमीटर सफर करता है। दिल्लीवासी सालभर में औसतन 1198 किलोमीटर की दूरी वाहन से तय करता है। अगर ट्रैफिक कानून के उल्लंघन की बात करें तो यहां सालभर में लगभग 14.6 करोड़ बार ट्रैफिक नियम तोड़े जाते हैं। दिल्ली पुलिस के सर्वे के मुताबिक दिल्ली के 48 फीसद ड्राइवर रोड रेज की घटनाओं के शिकार होते हैं

आमतौर पर गुस्सा आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जाती है। अन्य भावों की तरह यह भी एक भाव ही है, लेकिन जब गुस्सा इस हद तक बढ़ जाए कि व्यक्ति आपा खोकर हिंसक हो उठे तो यह मानसिक विकार कहलाता है।दिलवालों की दिल्ली का तमगा हासिल कर खुद पर फक्र महसूस करने वाली देश की राजधानी अब बदनाम होने लगी है। अब ऐसा लगने लगा है कि दिल्ली वालों के पास दिल बचा ही नहीं है। मामूली कहासूनी के बाद अब सड़को पर गुस्से में होने वाली हाथापाई और हत्या के लिए दिल्ली बदनाम होने लगी है। इस बदनाम होती दिल्ली को बचाने के लिए सबसे पहले गुस्से से बचना होगा।


(लेखक आलोक वर्मा समाचार प्लस के एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं)

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