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जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो कुछ भी हुआ उसके बाद देखते-देखते पूरा देश सुलग गया। हर वर्ग दो वर्ग में बंट गया..। लोगों की देभक्ति और बुद्धिजीविषा अचानक जग गई जग ही नहीं गई वो हर उस माध्यम का इस्तेमाल भी करने लगी जहां से उद्गार व्यक्त किए जा सकते थे। कुछ लोगों की विशेषज्ञता तो यहां तक बढ़ी कि वो छुपी हुई राजनीतिक मंशा के जानकार भी बन गए।

 

मगर किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की है कि जहां और जिस वीडियो से ये मुद्दा शुरू हुआ उस वीडियो का हश्र क्या हुआ। आखिरकार पुलिस ने वीडियो के आधार पर मुकदमा क्यों कर दिया और आम तौर पर साधारण चोर की जांच में भी हर कुछ छिपा कर चलने वाली दिल्ली पुलिस के मुखिया बीएस बस्सी इस पुरे मुद्दे पर बार बार यू टर्न लेते क्यों नजर आए।

 

क्राइम कवरेज का एक लंबा कैरियर रखने के नाते मैं इतना तो जानता हूं कि अगर आपके घर किसी तरह का हादसा हो जाए और आप दिल्ली के किसी थाने में पहुंचे तो आज भी मुकदमा दर्ज करवाना इतना आसान नहीं होता। मगर जेएनयू के मामले पर महज एक चैनल के वीडियो को आधार बनाकर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया गया। वैसे अगर हमारी धरती पर खड़े होकर कोई हमें ही गाली दे तो उसके खिलाफ कार्रवाई तो होनी ही चाहिए मगर फिर कार्रवाई का इरादा पक्का हो। किसी की इच्छा, जल्दबाजी से संचालित ना हो। इस मामले में पुलिस ने जिस वीडियो को मुकदमे का आधार बनाया उसी वीडियो की सत्यता की पुष्टि होने में अभी भी कम से कम एक सप्ताह लगेंगे। क्योंकि इस वीडियो को सीएफएसएल भेजा गया है औऱ रिपोर्ट आनी बाकी है।

 

जेएनयू में जो हुआ उसका पुलिस कार्रवाई के सार्वजनिक होने के बाद जो भी हुआ वो शायद काफी हद तक स्वाभाविक ही था। देश के लिए प्रेम रखने वाले तो प्रतिक्रियात्मक संकेत देंगे ही लेकिन इस पूरी कार्रवाई को राजनीतिक मंशा और एक खास संगठन से जोड़ देना क्या जाएज है।

 

क्या ये सच नहीं कि पुलिस कमिश्नर या कोई भी पुलिस अधिकारी किसी भी मामले की जांच पर जांच का हवाला देकर ज्यादातर बातें बताने से कतराते हैं मगर इस मामले मे वीडियो से लेकर पुलिसिया रिपोर्ट के कागजात तो बाहर आए ही पुलिस कमिश्नर खुद बार बार बयान देते रहे। कभी कहा कि सबूत हैं कभी कहा कि जमानत का विरोध नहीं करेंगे कभी कहा विरोध करेंगे। मगर जब उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात आई जिनके खिलाफ मुकदमा दर्ज था तो अचानक दिल्ली पुलिस ने शरीफ रवैया अपना लिया। वो यूनिवर्सिटी में रहे औऱ पुलिस बाहर अपने अपार सब्र की सीमा दिखाती रही। आखिर क्यों क्या उनकी गिरफ्तारी में देरी से देश में उनके पक्ष या विपक्ष में हवा नहीं फैल रही थी क्या उससे हमारे देश के साम्प्रादायिक सद्भावना के माहौल में किसी तरह का गड़बड़ी नहीं हो रही थी। औऱ सबसे बड़ी बात तो ये कि क्या जांच में देरी नहीं हो रही थी। आमतौर पर तनावपूर्ण माहौल होने पर पुलिस अपना गुपचुप कार्रवाई इतनी तेजी से करती है कि जल्दी किसी को खबर तक नहीं लगती। मगर इस मामले में दिल्ली पुलिस भी एक राजनीतिक पक्ष बन गई और इसीलिए किसी को सरकारी मंशा पर सवाल उठाने का मौका भी मिला।

(लेखक आलोक वर्मा समाचार प्लस के एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं)

 

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