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आज महंगाई के बारे में कुछ लिखने- पढने का मन नहीं करता है। मन करे भी तो कैसे। बाल और दाढी से तेज़ तो महंगाई बढ़ रही है। पहले सुनते थे चलती का नाम गाड़ी और बढ़ती का नाम दाढ़ी। लेकिन, अब बढ़ती का नाम है 'महंगाई'। यही कारण है कभी पेट्रोल चर्चा में तो कभी डीजल, कभी प्याज तो कभी टमाटर। इसी प्रकार तरह-तरह के अन्य सामान भी चर्चा में बने रहते हैं। वैसे तो प्याज काटते समय आंसू आते हैं लेकिन अभी तो खरीदते समय ही। विज्ञान ने हमें बताया कि प्याज काटते समय आंसू आते हैं लेकिन सरकारी अर्थशास्त्र के अनुसार प्याज काटने से पहले खरीदते समय ही आंसू आते हैं। टमाटर का भाव पूछिए,जैसे ही सब्जीवाली भाभी जी भाव बताएंगी आपको टमाटर आग का गोला लगने लगेगा। महंगाई की मार से सब परेशान है। हम भी, आप भी, सब्जी वाले भी, पेट्रोल पंप वाले भी, दूध वाले भी। सब परेशान है। कोई कम तो कोई ज़्यादा। पेट्रोल का मार्केट रेट देखकर मन करता है पेट्रोल पंप ही रहते तो चर्चा में भी बने रहते।और रेट भी बराबर बढ़ता रहता। दिल कभी-कभी बोल उठता है 'अगले जन्म मोहे पेट्रोल पंप ही कीजो'। मैं तो किसी बुज़ुर्ग से महंगाई पर बात करना ही छोड़ दिया हूं। जैसे ही वो बताने लगेंगे कि उनके जवानी के दिन में 1 रु. में इतना सामान मिल जाता था तो लगता है, गाली दे रहे हैं। सच पूछिए तो लगता है महंगाई से आम आदमी की जेब तो कब की जल चुकी है। कमर पता नहीं कब की टूट चुकी है अब तो दिल भी टूट गया है। स्वर्ग में कौटिल्य भी भारतीय अर्थव्यवस्था के नए-नए फॉर्मुले को देखकर पता नहीं क्या-क्या सोच रहे होंगे। रोज-रोज नए-नए आर्थिक फॉर्मुले को देखकर देश की आम जनता तो हक्का- बक्का है ही। लेकिन, सरकार ताल ठोक कर कह रही है देश में गरीबी कम हुई है। महंगाई का असर हमेशा से निम्न और मध्यम वर्गिय परिवारों पर भारी पड़ती रही है। कभी खाद्य तेल, कभी दूध, कभी सब्जी तो कभी डीजल-पेट्रोल। किसी चक्रवाती तुफान की तरह बढ़ रही महंगाई आज सबको अपने आगोश में ले चुकी है। इसका अंदाज़ा तो आप इसी बात से लगा सकते हैं कि, 2010 में 1 रु. में 2 गिलास पानी मिल जाता था। अब, 2013 में 2 रु. में 1 गिलास पानी मिल रहा है। इसी तरह अन्य खाद्य और दूसरे तरह के सामानों के भी दाम आसमान छू रहे हैं। काँग्रेस नेता मसूद साहब कहते हैं, 5 रु. में दिल्ली में एक वक्त का भरपेट भोजन मिलता है। अब कौन बताए नेताजी को दिल्ली में पेट खाली करने के 5 रु. लग जाते हैं। 5 रु. में भरना तो दूर की बात है। सुलभ शौचालय में आप जाइएगा तो 5 रु. ले ही लेते हैं। राजबब्बर साहब को 12 रु. में खाना मिल जाता है वो भी मुंबई में। पता नहीं इतने बड़े स्टार होकर वो क्या-क्या खाते फिरते हैं। योजना आयोग के अनुसार ग्रामिण क्षेत्र में 27.20 रु. में तो शहरी क्षेत्र में 33.33 रु. में आप अपना पेट भर सकते हैं। आपके जानकारी के लिए बता दूं कि, दिल्ली स्थित योजना आयोग भवन में एक दिन में केवल पानी ठंडा करने और एयर कंडीशन चलाने का ख़र्च 60 हज़ार रु. का आता है। ये भी जान लीजिए, योजना आयोग भवन में जो टॉयलेट बनाया गया था उसका ख़र्च सुनकर आप हैरान हो जाएंगे। 38 लाख रुपए का खर्च आया था। एक बात और सरकार को पता नहीं ये कब समझेगी कि हम सत्य से भागकर ज्यादा दिन तक नहीं रह सकते। ख़ैर, जनतंत्र का मेला लगा है सब अपने-अपने तरीके से अपनी कला दिखाने में लगे हुए हैं। आम जनता करे भी तो क्या करे ? कलाबाज़ों की कला देख रही है।   

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