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मुजफ्फरनगर के जय भगवान से अगर आप एक बार मिल लिए तो रातों रात लखपति बनने के फॉर्मुले वाली किताब पढ़ने की कोई जरुरत ही नहीं। इनका नाम ही सिर्फ जय भगवान नहीं है, इस भगवान पर ऊपर वाले भगवान की कृपा भी ऐसी थी कि दिन दोगुनी रात चौगुनी वाली कहावत ही छोटी पड़ गई। नई कहावत बनी, दिन आठ गुनी और रात का तो छोड़ ही दीजिए।         

मुजफ्फरनगर की जानसठ तहसील में लेखपाल के पद पर बैठे जय भगवान के संपत्ति विस्तार को देखकर स्वर्ग में चार्ल्स डार्विन भी सन्नाटे में रह गए होंगे। डेवलपमेंट के लिए छटपटा रहा देश और देश के करोड़ों नागरिक रोज-रोज अपने-अपने बटुए की टोह लेकर सो जाते हैं। लेकिन जय भगवान के बटुए में मनी प्लांट ने ऐसी जड़ जमायी है कि पत्ता-पत्ता लाख बरसा के सूख जाता है।

देश रॉबर्ट वाड्रा के नाम पर फैली ज़मीन की गिनती में उलझा रहता है। लेकिन असली खिलाड़ी तो निकले लेखपाल साहब, एक गिलास पानी लेकर पूरी कहानी पढ़िएगा। क्योंकि इतनी तेज़ी से संपत्ति को बढ़ाने वाली कहानी आपने शायद ही कभी सुनी हो।

दो से चार...चार से आठ...आठ से अठ्ठारह बनाने वाले तो बहुत हैं इस देश में लेकिन अठ्ठारह को अठहत्तर में बदलने का खेल तो जय भगवान ने ही किया है। कैसे, ऐसे कि सिर्फ 11 बीघे जमीन को 1500 बीघे में बदल दिया। वो भी सिर्फ कुछ सालों में। चकराइए नहीं। घबराइए भी नहीं। ये तो सिर्फ ट्रेलर है, पूरी कहानी ऐसी है कि संपत्ति के बारे में सही-सही जानकारी जुटाने के लिए एक कमेटी बनानी पड़ी है। 

कच्चे घर और उजड़ी हुई छत के नीचे पैदा होने वाले जय भगवान दर्जनों आलिशान फ्लैटों के मालिक यूं ही नहीं बन गए। पहले ग़रीबों की ज़मीन हड़पी। फिर ग़रीबों को सताया। अपनी पहुंच का पूरा-पूरा इस्तेमाल किया। फिर सरकारी ज़मीन को भी निजी बनाने में देर नहीं की। लेकिन पाप की पोटली तो एक दिन भर ही जाती है। भर गई। सारा खेल सार्वजनिक हो गया। और लूट की लंका का विभीषण बना गांव का एक ग़रीब।

जय भगवान संपत्ति को हड़पने का अच्छा, बड़ा और मंझा हुआ कलाकार है। इसकी कलाकारी का एक नमूना और पढ़िए। लेखपाल साहब की पोस्टिंग कहीं भी क्यों न हो लेकिन मुजफ्फरनगर के खादर क्षेत्रों में इनकी मर्जी के बगैर अभी भी कोई काम नहीं होता है। ये बात अलग है कि जय भगवान के खिलाफ धोखाधड़ी से लेकर चार सौ बीसी और कई धाराओं में पहले से कई मुकदमें दर्ज हैं।

देश के प्रधानमंत्री गंगा को स्वच्छ करने में जुटे हैं। और जय भगवान बिल्कुल सफाचट करने में। ज़मीन हड़पने की लालच में लेखपाल ने गंगा की ज़मीन को भी बेच दिया। डर और भय को ताक पर रख कर। 

इतनी कहानी के बाद भी अपने को मासूमियत का सबसे बड़ा मूर्तीकार बता रहे जय भगवान से जब सच जानने की कोशिश की गई तो मुख्य सवालों के जवाब को छोड़कर सारे जवाब मिल गए। लेकिन अंत तक ये पता नहीं चल पाया, कि कैसे 11 बीघे को 1500 बीघे में बदला गया। ये कुचक्र रचा गया है मुझे फंसाने के लिए, ये अंतिम जवाब था लेखपाल साहब का।

काश ! दुनिया में अमीरी की कोई परिभाषा होती। नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि सिस्टम के आलाधिकारी इसे नहीं जानते हैं। दिक्कत है, एक चोर जब दूसरे चोर को चोर कह दे या कहने लगे तो डर सबके लिए एक बराबर सा हो जाता है। 

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