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अभी-अभी कुछ ही दिन हुए हैं उन्हें उत्तर प्रदेश का डी० जी० पी० बनाया गया है....उत्तर प्रदेश जिसे   अभी कुछ दिनों से खूबसूरत और रंगारंग विज्ञापनों के माध्यम से उम्मीदों का प्रदेश बताया जा रहा है वहां की जनता को हमेशा की तरह ही इस बार भी मनभावन उम्मीद दी गयी कि नए डी० जी० पी० साहब आये हैं और ये साहब प्रदेश की लचर कानून व्यवस्था में जबरदस्त सुधार ले आयेंगें....लेकिन यह सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था में यदि वास्तविकता में सुधार आ जाये तो यह अपने आप में घटने वाली एक असाधारण बात होगी....जाहिर है असाधारण लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अतुलनीय कार्य करना होगा....इसी कड़ी में नियुक्ति होने के कुछ दिन बाद ही हमारे प्रदेश के डी० जी० पी० साहब ने इस बारे में आधी सफलता भी प्राप्त कर ली....हालाँकि इससे प्रदेश की बद से बदतर होती जा रही कानून व्यवस्था में कोई सुधार तो नहीं आया पर डी० जी० पी० साहब ने अतुलनीय कार्य ज़रूर कर दिया....एक अद्भुत सम्बोधन देते वक़्त वह अत्यधिक भावुक हो गए और शायद यह भूल गए कि वो ज़ुर्म और अपराध के दहशत भरे माहौल से जूझने वाली उत्तर प्रदेश की आम जनता नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के पुलिस विभाग के सेनापति हैं....खैर यह कोई माहौल रहा हो ,उनके दिल का हाल रहा हो या फिर उन्हें कोई व्यक्तिगत मलाल रहा हो....जो भी हो डी० जी० पी०  साहब अपने ही सिपहसालारों से खुश नहीं है....और इन्तेहाँ तो तब हो गयी जब वो खुलेआम कहने लगे कि प्रदेश के अधिकतर जिलों के एस० पी० लुटेरों से भी बदतर काम कर रहे हैं....वो यहीं तक नहीं रुके बल्कि उन्होंने कुछ अपराधों की प्रकृति का विश्लेषण भी कर दिया, कि तमाम गैरकानूनी काम जैसे जबरन उगाही,ट्रांसफर पोस्टिंग की दलाली और जमीनों पर अवैध कब्ज़े करने में कई कप्तान लिप्त हैं....जैसे ही यह बात निकली लोग आश्चर्य में पड़ गए, आश्चर्य इस बात का नहीं था कि पुलिस डिपार्टमेंट के कुछ लोग गैरकानूनी धंधों में लगे हुए हैं या उनके सहयोग से ये धंधे चल रहे हैं, क्योंकि अमूमन इस बारे में लोग जानते हैं....अचरज इस बात का है कि प्रदेश के पुलिस विभाग की कमान खुद सँभालने वाला व्यक्ति अगर ऐसी बातें करेगा तो पुलिस डिपार्टमेंट के कुछ ईमानदार लोग जो जमीन पर कानून की गरिमा बचाये हुए हैं उनके मनोबल पर क्या प्रभाव पड़ेगा,उन्होंने इसकी तनिक भी चिंता नहीं की....साहब कम से कम इस बात की तो फ़िक्र कर लेते कि प्रदेश की जनता के मन में  कानून व्यवस्था के ठीक होने की जो मृग मरीचिका व्याप्त रहती हैं उसका अस्तित्व तो बना रहता....लेकिन डी० जी० पी० साहब के आत्मविश्वास के क्या कहने जैसे ही विभाग के सर्वोच्च पद की जिम्मेदारी मिली तो उन्होंने इसे अधिकार समझकर जो मन में आया कह दिया....मसला ये है कि अगर ज़िम्मेदारी नहीं निभानी थी और सिर्फ आरोप लगाकर अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला ही झाड़ना था तो साहब राजनीति में शामिल होकर नेता जी बन जाते और मंच से कुछ भी कह देते, आपके पिछलग्गू तो यही कहते नेता जी संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं, बात समझ में भी आती हैं....लेकिन गौर कीजिये ये ज़रा दूसरे हालात हैं आप पर पूरे प्रदेश के कानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी है,अगर प्रदेश स्तर का मुख्य अधिकारी अपने से निचले अधिकारियों को नकारा या गलत बता कर अथवा उन पर आरोप लगाकर अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश करेगा तो फिर यह प्रक्रिया तो पूरे विभाग में लागू हो जाएगी....डी० जी० पी० साहब कप्तानों को दोषी करार दे रहे हैं, ऐसे में कप्तान एस० एच० ओ० को, एस० एच० ओ० दरोगा को,दरोगा कांस्टेबल को और कांस्टेबल सिपाही को दोषी करार दे देंगें....और अंत में जब पुलिस विभाग की सबसे छोटी इकाई यानि कि किसी सिपाही से इस बारे में बात करेंगे तो भोलेपन,मज़बूरी,कुंठा और क्षोभ के मिले जुले भाव में वह यही कहता है कि हम क्या कर सकते है साहब जैसा बड़े साहब बोलते हैं हम वैसा ही कर देते हैं....भाई पूरी नौकरी जो ठीक से करनी है....वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं जो यह कह रहे हैं कि ये डी० जी० पी० साहब की ईमानदारी है, कि उन्होंने बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखी है.... अब ये रायबहादुर लोग समाजिक स्तर पर समालोचक हैं या व्यक्तिगत स्तर पर चाटुकार या फिर हद से ज़्यादा आशावादी जो भी हो पुलिस विभाग के गलियारे में डी० जी० पी० साहब की ईमानदारी वाले किस्से तो हमने भी सुन रखे है....डी० जी० पी० साहब कितने ईमानदार और खरे है ये तो हम भी जानते हैं....खैर तकलीफ इस बात की नहीं है कि कौन क्या है....तकलीफ इस बात की है कि जिसकी जो ज़िम्मेदारी है वह ज़िम्मेदारी ठीक से न निभा कर प्रमुख लोग अपने कर्तव्य पथ से भटक रहे हैं ....आलम यह है कि उत्तर प्रदेश के पुलिस विभाग के मुख्य अधिकारी नेताओं की तरह बयान दे रहे हैं,नेता अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं,अपराधियों के हाथ में कानून व्यवस्था हैं,ऐसे चक्रव्यूह जैसे माहौल में प्रदेश की आम जनता की सुरक्षा के लिए अर्जुन जैसे व्यक्तित्व की आवश्यकता है जबकि पुलिस विभाग के मुखिया भीष्म पितामह की तरह कानून व्यवस्था का चीरहरण होते हुए देख रहे हैं.... उत्तर प्रदेश में पत्रकार जलाये जा रहे हैं,थाने में महिलाओं को अपमानित किया जा रहा है,आये दिन हत्याओं की ख़बरें सामने आ रहीं हैं,छोटे- मोटे अपराधों की संख्या तो पूछिये ही  मत....और नेतृत्व करने वाले लोग जिम्मेदारी भरा कदम उठाने की जगह अपने ही विभाग के लिए नकारात्मक बयान देकर अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए बौद्धिक बहाने खोज रहे हैं....ये बयानबहादुरों के व्यवहारिक बुद्धिहीनता का ही उदाहरण हैं....ऐसे में जुर्म और अपराधियों की दहशत से परेशान दीन-हीन जनता की सुरक्षा कौन करेगा ? एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार समस्या का सामना करने में जितनी तकलीफ नहीं होती उससे ज़्यादा तकलीफ समस्या के बारे में सोंचकर होती है....अगर गौर करेंगें तो उत्तर प्रदेश की जनता का भी यही मनोविज्ञान है अपराध की पीड़ा जो झेल रहे हैं वो तो झेल ही रहे हैं लेकिन अपराध घटने की संभावना के माहौल से लोग ज़्यादा पीड़ित है ऐसे में डी० जी० पी० साहब का बेबाक बयान इस मनोवैज्ञानिक पीड़ा में इज़ाफ़ा ही करता है....विश्व के महान साम्राज्यों में शुमार रोमन साम्राज्य बयानों के बल पर नहीं बल्कि ज़मीन पर युद्ध लड़कर स्थापित किया गया था....करिश्माई नेपोलियन बोनापार्ट इसलिए फ्रांस को ताकतवर बना पाया क्योंकि उसे भरोसा था कि वह कोई भी असंभव कार्य कर सकता था....इन दो उदाहरणों से मैं अपने इतिहास के ज्ञान का बखान नहीं कर रहा हूँ बल्कि दो विशेष बातों को सामने लाना चाहता हूँ और वो हैं संघर्ष करने की इच्छा और प्रबल आत्मविश्वास जिनकी सबसे अधिक आवश्यकता हमारे प्रदेश के पुलिस विभाग को है क्योंकि पुलिस विभाग की प्रमुख ज़िम्मेदारी अपराध और अपराधियों पर नियंत्रण रखना है और यकीन मानिये यह ज़िम्मेदारी युद्ध लड़ने से कम नहीं है,जो कि बयानों या बातों से पूरी होने वाली नहीं.....अब ज़ाहिर सी बात है किसी व्यक्ति को बड़ी ज़िम्मेदारी इसलिए सौपीं जाती है कि वह समस्या का समाधान खोजे नहीं तो समस्याओं का विश्लेषण और उस पर ज्ञान का तड़का तो उत्तर प्रदेश के नुक्कड़ों, चौपालों,चाय और पान की दुकानों तथा फेसबुक और ट्विटर पर बहुतायत मात्रा में प्राप्त हो रहा है....फिर बहुत बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि बड़े पद की ज़िम्मेदारी और गरिमा क्या होती है? क्या इसे सुनिश्चित किया जायेगा?....अंत में सभी उच्च पद पर बैठे हुए अधिकारियों से यही निवेदन है कि वह अपनी ज़िम्मेदारी सही से निभाते हुए समस्याओं का समाधान खोजें....यदि वे ठीक से ज़िम्मेदारी नहीं उठा पा रहे हैं तो कम से कम रायबहादुर और बयानबहादुर बनकर अपने और अन्य  लोगों के लिए व्यर्थ की समस्याएं खड़ी न करे.... नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि सरकारी अधिकारियों के नकारापन से आज़िज़ आकर प्रदेश की जनता खुद खड़ी हो जाये और कानून व्यवस्था स्वयं अपने  हाथों में लेकर सड़कों पर उतर आये और चारों तरफ कान के परदे फाड़ देने वाला शोर सुनाई देने लगे,इंक़लाब ज़िंदाबाद....माननीयों अभी भी समय है जाग जाइये....जय हिन्द (लेखक प्रवीण साहनी समाचार प्लस के कार्यकारी संपादक हैं)

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