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संजय लीला भंसाली की बहुचर्चित फिल्म 'पद्मावती', बहुचर्चित इसलिए हैं क्योंकि जिस तरह से पिछले काफी वक्त से इस फिल्म को लेकर विवाद छिड़ा है। ये फिल्म रिलीज से पहले ही हिट तो हो ही गई है। कर्णी सेना से लेकर सियासी गलियारों तक में फिल्म का विरोध जोरशोर से हो रहा है। कोई दीपिका की नाक काटने की धमकी दे रहा है, तो कोई 'सो कॉल्ड' सांस्कृति का ठेकेदार अपनी सभ्यता को बचाने के लिए संजय लीला भंसाली को थप्पड़ जड़ रहा है। विवाद लगातार जारी है, फिल्म के निर्देशक से लेकर एक्टर अपने तर्क पर अड़े हुए हैं, लेकिन दूसरा गुट फिल्म को रोकने पर अड़ा है। हो भी क्यों ना साहब माता 'पद्मावती' के चरित्र पर कोई कैसे उंगली उठा सकता है।

अलबत्ता वो बात अलहदा है कि जिस राज्य में इसका सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है वहां आज भी भ्रूण हत्या और ऐसी कई कुरीतियां मौजूद हैं, राजस्थान के कई इलाकों में आज भी महिलाएं लंबा घूंघट काड़ने को मजबूर हैं। अभी भी कम उम्र और नाबालिग बच्चियों के विवाह होते हैं। आज भी शादी के वक्त मोटा दहेज लेने की प्रथा जारी है। इसके अलावा लड़की और लड़के का जो फर्क मौजूद है वो अलग रहा। लड़कियों को व्यर्थ और लड़कों को उपयोगी माना जाने की घृणित एवं पक्षपातपूर्ण मान्यता भी एक बहुत बड़ी समस्या है। अगर जौहर देना ही है तो पहले इन कुरीतियों का दिया जाना चाहिए। ना सिर्फ आपका बल्कि समाज का भी भला होगा। हालांकि इस पर भी शक की माकूल गुंजाइश है कि क्या 'पद्मावती' नाम की कोई रानी थीं भी या नहीं। ये सिर्फ एक ख्याल तो नहीं था।

 

खैर, इस बहस में पड़ने का मेरा मकसद नहीं है, तो पड़ूंगा भी नहीं। फिलहाल जहन में एक ख्याल घूमड़-घूमड़ कर रहा है बहुत वक्त से, फिल्म का ऐलान तो काफी पहले भंसाली ने कर दिया था। फिल्म की शूटिंग भी हुई और वो बनकर तैयार भी है। मानता हूं कि फिल्म से जुड़े विवाद काफी पहले ही शूटिंग के दौरान शुरू हो गए थे। लेकिन अचानक राष्ट्रभक्त ब्रिगेड इतना एक्टिव कैसे हो गया, क्यों सभ्यता की दुहाई देने वाले अचानक से जमा हो गए। क्या ये कोई सोची समझी साजिश है।

'पद्मावती' का नाम सुनते ही कुछ सवाल जहन में कौंधने लगते हैं, क्योंकि प्रोफेशन के लिहाज से  हर बात नेताओं और सियासत तक आकर ठहर जाती है। सोच भी वहीं आकर रुक जाती है। इसलिए सवाल भी कुछ ऐसे ही हैं। 

-आखिर 'पद्मावती' पर इतना विवाद क्यों है? ये सारा फजीता कहीं राजपूत वोटों के लिए तो नहीं हो रहा है? ये सवाल इसलिए भी क्योंकि देश के हर राज्य में राजपूत वोटरों  की एक बहुत बड़ी जमात है, और उनका वोट काफी अहमियत भी रखाता है। और शायद इसी सियासी गणित की वजह से 'पद्मावती' मु्द्दे पर राजनीति भी हो रही है। या यूं कहे कि हर कोई अपनी राजनीति को चमकाने में लगा है। ये  कोई हवाबाजी नहीं है। 

 

तथ्य तो ये ही बताते हैं, आप भी देखिए

गुजरात में 17 से 18 जिलों में करीब 10% राजपूत वोट हैं

ये 10 फीसदी वोट करीब 20 से 25 सीटों पर जीत और हार का फैसला करता है

उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव चल रहे हैं, जहां 10 से 11फीसदी राजपूत वोटर हैं

राजस्थान में अगले साल चुनाव होने हैं और यहां 7 से 8 फीसदी वोटर राजपूत हैं

मध्यप्रदेश में भी 2018 में चुनाव हैं, और यहां भी 7 से 8 % राजपूत वोट हैं, जो  40-45 सीटों पर बेहद निर्णायक साबित होते हैं। 

 

ये तो राज्यों की बात है, अब जरा देश पर एक नजर डालिए क्योंकि 2019 भी कोई बहुत ज्यादा दूर नहीं है। देश में राजपूतों की आबादी 7।5 करोड़ है। जो कुल आबादी का 5% हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 1।5 करोड़ राजपूत हैं। जो 100 सीटों पर अहम रोल निभाते हैं। और शायद ये वो ही सियासी गुणा भाग है जो हमारे सियासी नुमाइंदे कर चुके हैं। 

 

मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान 'पद्मावती' को राष्ट्रमाता बता चुके हैं तो राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकार भी 'पद्मावती' मामले पर अपना रुख साफ कर चुकी है। ममता बनर्जी जरूर फिल्म के पक्ष में खड़ी हुई हैं लेकिन इसके पीछे उनकी अपनी राजनीति भी साफ दिखाई दे रही है। 

एक तरफ बीजेपी ब्रिगेड है तो दूसरी तरफ ऐसे नेता भी हैं जो अपने ही हिसाब से बैटिंग कर रहे हैं। रामपुर में समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने बीजेपी को घेरने के लिए जोधा अकबर तक का इतिहास खंगाल दिया। उधर पार्टी की लाइन से हटकर पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह 'पद्मावती'के विरोध में खड़े दिख रहे हैं। साफ जाहिर है कि हर कोई 'पद्मावती' के बहाने राजपूतों की राजनीति साधने में और अपनी सियासी रोटियों को सेकने में लगा है।

 

अमान अहमद

 प्रोड्यूसर

समाचार प्लस

(ये लेखक के अपने विचार हैं, इससे चैनल या वेबसाइट का किसी तरह से भी कोई लेना देना नहीं है।)

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