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2016 का अंत सरकार के दो बड़े आर्थिक फैसलों से हुआ है, पहला नोटबंदी और दूसरा GST। हालांकि इन दोनों फैसलों के प्रभाव से आम जनता पूरी तरह से अनजान है। साल 2017 का बजट दो नए बदलावों का भी गवाह बनेगा...

1-  रेल बजट और आम बजट एक साथ पेश होंगे.
2. इस बार फरवरी के पहले हफ्ते में बजट सत्र शुरू होगा.

नोटबंदी से उबर रहे इस दौर में लोगों को मोदी सरकार के इस बजट से काफी उम्मीदें है। देश की जनता वित्त मंत्री अरुण जेटली से काफी उम्मीदें लगाएं बैठी है। खासतौर पर टैक्स के मोर्चे पर, कहा जा रहा है कि डीमोनिटाइजेशन की वजह से अर्थ व्यवस्था पर पड़े असर को साधने के लिए इनकम टैक्स स्लैब से जुड़े कई अहम फैसले किए जा सकते हैं। कारोबारियों से लेकर निवेशकों तक सब लोग जेटली से ऐसे ऐलान की उम्मीद लगाए बैठे हैं जिससे ग्रोथ को रफ्तार मिल सकेगी।
व्यक्तिगत आयकर छूट सीमा मौजूदा 2.5 लाख रुपए से बढ़ाई जा सकती है।

अलग-अलग जानकार और अर्थशास्त्री इस बारे में अलग-अलग राय और अनुमान रखते हैं। कुछ जानकर मानते हैं कि यह लिमिट ढाई लाख रुपए से बढ़ाकर तीन लाख की जा सकती है जबकि कुछ का मानना है कि यह साढ़े तीन लाख तक भी की जा सकती है। पिछले बजट में जेटली ने सेक्शन 80CCD (1) के तहत नेशनल पेंशन स्कीम में निवेश करने पर 50 हजार रुपए अतिरिक्त टैक्स छूट की अनुमति दी थी। यानी, कुल मिलाकर आप 2 लाख रुपए की छूट ले सकते थे। ये  80C और 80CCD दोनों के तहत निवेश करने पर मिलती है। अब इसमें, जानकार कहते हैं कि सेविंग इंट्रेस्ट रेट कम होने के कारण 50 हजार रुपए से ढाई लाख रुपए तक की छूट मिलनी चाहिए।

दूसरी तरफ जीएसटी के अमल को लेकर अब भी बहुत से सवाल बाकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि ऐसे काफी सवालों का जवाब जेटली साहब के इस बजट में मिल सकता है। हालांकि जीएसटी लागू करने का एक मकसद टैक्स स्लैब को सरल बनाना भी है। लिहाजा इस बात पर भी नजर रहेगी कि कपड़ा, सीमेंट, ऑटो जैसे उद्योगों में अलग-अलग उत्पाद शुल्क का जो इंतेजाम हैं, उसे किस हद तक एकरूप बनाया जा सकता है। वहीं जीएसटी का एक असर यह भी होगा कि बहुत-सी मौजूदा रियायतें खत्म की जा सकती हैं।

जीएसटी के अलावा किसानों के लिए इस बजट से काफी उम्मीदें हैं। खास तौर पर ऐसे वक्त में जब हमारे किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। विकास ब्रांडेड सरकार की एक कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविक जरूरत है। राष्ट्रवाद की तरह यह सिर्फ एक जोश बढ़ाने वाली चीज नहीं है। हकीकत तो ये है कि बदलाव के लिए हमें अपने रास्ते को उत्पादन के बजाय प्रॉफिट पर लाना पड़ेगा। एक तरफ 'इंडिया' है, जो डिजिटल है, कॉरपोरेट है और दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है।

दूसरी तरफ 'भारत' है जो मिट्टी का एहसास कराता है और 'इंडिया' के लिए अनाज उगाता है। एक और अहम बदलाव फल और सब्जियों को एपीएमसी ऐक्ट से बाहर ले जाने का है। इसके पीछे दलील है कि इससे बड़ी संख्या में किसानों को मदद मिलेगी। फल और सब्जियों के उत्पादन के मामले में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर है। नेशनल हॉर्टीकल्चर बोर्ड के मुताबिक, 2014-15 के दौरान भारत में फलों का उत्पादन 86.602 मिलियन मीट्रिक टन रहा। इसी दौरान सब्जियों का उत्पादन 169.478 मिलियन मीट्रिक टन रहा। इस दौरान फलों का पैदावार क्षेत्र 6.110 मिलियन हेक्टेयर रहा। सब्जियों का जुताई क्षेत्र 9.542 मिलियन हेक्टेयर रहा।

मतलब 'अच्छे दिनों' के इस दौर में उम्मीदें तो बहुत हैं, लेकिन 1 फरवरी को जेटली जी के पिटारे क्या ऐलान किए जाएंगे उसपर देश की निगाहें टिकी हुई है।

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