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संजय लीला भंसाली की बहुचर्चित फिल्म 'पद्मावती', बहुचर्चित इसलिए हैं क्योंकि जिस तरह से पिछले काफी वक्त से इस फिल्म को लेकर विवाद छिड़ा है। ये फिल्म रिलीज से पहले ही हिट तो हो ही गई है। कर्णी सेना से लेकर सियासी गलियारों तक में फिल्म का विरोध जोरशोर से हो रहा है। कोई दीपिका की नाक काटने की धमकी दे रहा है, तो कोई 'सो कॉल्ड' सांस्कृति का ठेकेदार अपनी सभ्यता को बचाने के लिए संजय लीला भंसाली को थप्पड़ जड़ रहा है। विवाद लगातार जारी है, फिल्म के निर्देशक से लेकर एक्टर अपने तर्क पर अड़े हुए हैं, लेकिन दूसरा गुट फिल्म को रोकने पर अड़ा है। हो भी क्यों ना साहब माता 'पद्मावती' के चरित्र पर कोई कैसे उंगली उठा सकता है।

अलबत्ता वो बात अलहदा है कि जिस राज्य में इसका सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है वहां आज भी भ्रूण हत्या और ऐसी कई कुरीतियां मौजूद हैं, राजस्थान के कई इलाकों में आज भी महिलाएं लंबा घूंघट काड़ने को मजबूर हैं। अभी भी कम उम्र और नाबालिग बच्चियों के विवाह होते हैं। आज भी शादी के वक्त मोटा दहेज लेने की प्रथा जारी है। इसके अलावा लड़की और लड़के का जो फर्क मौजूद है वो अलग रहा। लड़कियों को व्यर्थ और लड़कों को उपयोगी माना जाने की घृणित एवं पक्षपातपूर्ण मान्यता भी एक बहुत बड़ी समस्या है। अगर जौहर देना ही है तो पहले इन कुरीतियों का दिया जाना चाहिए। ना सिर्फ आपका बल्कि समाज का भी भला होगा। हालांकि इस पर भी शक की माकूल गुंजाइश है कि क्या 'पद्मावती' नाम की कोई रानी थीं भी या नहीं। ये सिर्फ एक ख्याल तो नहीं था।

 

खैर, इस बहस में पड़ने का मेरा मकसद नहीं है, तो पड़ूंगा भी नहीं। फिलहाल जहन में एक ख्याल घूमड़-घूमड़ कर रहा है बहुत वक्त से, फिल्म का ऐलान तो काफी पहले भंसाली ने कर दिया था। फिल्म की शूटिंग भी हुई और वो बनकर तैयार भी है। मानता हूं कि फिल्म से जुड़े विवाद काफी पहले ही शूटिंग के दौरान शुरू हो गए थे। लेकिन अचानक राष्ट्रभक्त ब्रिगेड इतना एक्टिव कैसे हो गया, क्यों सभ्यता की दुहाई देने वाले अचानक से जमा हो गए। क्या ये कोई सोची समझी साजिश है।

'पद्मावती' का नाम सुनते ही कुछ सवाल जहन में कौंधने लगते हैं, क्योंकि प्रोफेशन के लिहाज से  हर बात नेताओं और सियासत तक आकर ठहर जाती है। सोच भी वहीं आकर रुक जाती है। इसलिए सवाल भी कुछ ऐसे ही हैं। 

-आखिर 'पद्मावती' पर इतना विवाद क्यों है? ये सारा फजीता कहीं राजपूत वोटों के लिए तो नहीं हो रहा है? ये सवाल इसलिए भी क्योंकि देश के हर राज्य में राजपूत वोटरों  की एक बहुत बड़ी जमात है, और उनका वोट काफी अहमियत भी रखाता है। और शायद इसी सियासी गणित की वजह से 'पद्मावती' मु्द्दे पर राजनीति भी हो रही है। या यूं कहे कि हर कोई अपनी राजनीति को चमकाने में लगा है। ये  कोई हवाबाजी नहीं है। 

 

तथ्य तो ये ही बताते हैं, आप भी देखिए

गुजरात में 17 से 18 जिलों में करीब 10% राजपूत वोट हैं

ये 10 फीसदी वोट करीब 20 से 25 सीटों पर जीत और हार का फैसला करता है

उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव चल रहे हैं, जहां 10 से 11फीसदी राजपूत वोटर हैं

राजस्थान में अगले साल चुनाव होने हैं और यहां 7 से 8 फीसदी वोटर राजपूत हैं

मध्यप्रदेश में भी 2018 में चुनाव हैं, और यहां भी 7 से 8 % राजपूत वोट हैं, जो  40-45 सीटों पर बेहद निर्णायक साबित होते हैं। 

 

ये तो राज्यों की बात है, अब जरा देश पर एक नजर डालिए क्योंकि 2019 भी कोई बहुत ज्यादा दूर नहीं है। देश में राजपूतों की आबादी 7।5 करोड़ है। जो कुल आबादी का 5% हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 1।5 करोड़ राजपूत हैं। जो 100 सीटों पर अहम रोल निभाते हैं। और शायद ये वो ही सियासी गुणा भाग है जो हमारे सियासी नुमाइंदे कर चुके हैं। 

 

मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान 'पद्मावती' को राष्ट्रमाता बता चुके हैं तो राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकार भी 'पद्मावती' मामले पर अपना रुख साफ कर चुकी है। ममता बनर्जी जरूर फिल्म के पक्ष में खड़ी हुई हैं लेकिन इसके पीछे उनकी अपनी राजनीति भी साफ दिखाई दे रही है। 

एक तरफ बीजेपी ब्रिगेड है तो दूसरी तरफ ऐसे नेता भी हैं जो अपने ही हिसाब से बैटिंग कर रहे हैं। रामपुर में समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने बीजेपी को घेरने के लिए जोधा अकबर तक का इतिहास खंगाल दिया। उधर पार्टी की लाइन से हटकर पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह 'पद्मावती'के विरोध में खड़े दिख रहे हैं। साफ जाहिर है कि हर कोई 'पद्मावती' के बहाने राजपूतों की राजनीति साधने में और अपनी सियासी रोटियों को सेकने में लगा है।

 

अमान अहमद

 प्रोड्यूसर

समाचार प्लस

(ये लेखक के अपने विचार हैं, इससे चैनल या वेबसाइट का किसी तरह से भी कोई लेना देना नहीं है।)

ये सियासी बिसात है साहब....

उत्तर प्रदेश में पहले चरण के मतदान में अब कुछ ही दिन बचे हैं । 11 फरवरी को उत्तर प्रदेश के 15 जीलों की 73 सीटों पर मतदान होना है । मतलब चुनाव अब सर पर है और उत्तर प्रदेश में सियासत का पारा पूरी तरह गर्म है । चुनाव की तारीख नजदीक आते ही सियासी दलों के नुमाइंदों ने भी अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया हैं । कल तक विकास वाली सियासत करने का दावा करने वाले सभी दल उसे भूल गए हैं । बीजेपी एक बार फिर राम मंदिर और तीन तलाक जैसे मुद्दों के साथ अपने हिंदूवादी एजेंडे की तरफ लौट गई है । तो दलितों की राजनीति करने वालीं मायावती खुलेआम मुसलमानों से उनके लिए वोट करने की अपील कर रही हैं । उधर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी भी मुसलमानों पर अपना हक जताने में लगी है । मतलब साफ है सियासत अब पूरी तरह से वोटों के ध्रुवीकरण के लिए की जा रही है । बीजेपी की तरफ से नेताओं का एक बड़ा तब्का हिंदुत्व वाली बयानबाजी कर रहा है । तो समाजवादी पार्टी की तरफ से ये जिम्मेदारी पार्टी का मुस्लिम चेहरा आजम खान को सौंपी गई है ।

मुस्लिम वोटों पर है नजर

एक वीडियों के जरिये मायावती अल्पसंख्यक समाज के लोगों को अपना वोट खराब ना करने की सलाह दे रही हैं । तो आजम खान मायावती के 10 साल पुराने एक बयान को खूब उछाल रहे हैं । मतलब सारी लड़ाई अब मुस्लिम वोटों के लिए की जा रही हैं । और हो भी क्यों ना ? उत्तर प्रदेश में कुल 20 फीसदी मुस्लिम वोट हैं । और इस बार ये मुस्लिम वोट किस तरफ जाएंगे, इस पर हर पार्टी की नजर है. अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी यादव मुस्लिम समीकरण को सत्ता की चाभी मानती है । तो मायावती दलित-मुस्लिम वोटों के बल पर दोबारा यूपी की गद्दी पाने की जुगत में लगी हुई हैं ।



यूपी में क्यों अहम हैं मुस्लिम ?

सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर चुनाव आते ही मुस्लमान इतने अहम क्यों हो जाते हैं । दरअसल उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें हैं । जिनमें से 143 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता ज्यादा हैं. 2012 में इन 143 सीटों में से 72 सीटें समाजवादी पार्टी को मिली थीं । जबकि बीएसपी को 26, बीजेपी को 26 और कांग्रेस-आरएलडी गठबंधन को सिर्फ 14 सीटें मिली थीं । यानी सबसे ज्यादा सीटे समाजवादी पार्टी को मिली जबकि बीजेपी औप बीएसपी को 26 सीटों से संतोष करना पड़ा । और ये ही एक बड़ी वजह समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की है । और इसी वजह से मायावती का भी डर बढ़ गया है । मायावती को लगता है कि कहीं इस बार सारा मुस्लिम वोट एसपी और कांग्रेस के इस गठबंधन की तरफ ना ट्रांस्फर हो जाए । इसीलिए मायावती अपनी हर रैली में खास तौर से मुस्लिम मतदाताओं से वोट देने की अपीलकरना नहीं भूलतीं हैं । इसीलिए मायावती ने 97 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट भी दिया है ।



बयानों के जरिये ध्रुवीकरण की कोशिश

एक तरफ समाजवादी पार्टी और मायावती मुसलमानों का रुख अपनी तरफ करने में लगी है । तो बीजेपी अपने पुराने हिन्दुत्व के एजेंडे की तरफ लौट रही है । जिसके पीछे सोच बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की है । हालांकि इसकी नींव अमित शाह ने बीजेपी के घोषणा पत्र जारी करते वक्त ही रख दी थी । शाह का पहला दांव था बाबरी विवादित ढांचा, दूसरा दांव था स्लॉटर हाउसों पर पाबंदी और तीसरा दांव था पलायन । ये तीनों वो ही मुद्दे हैं जिनके जरिये बीजेपी वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश करती रही है । अमित शाह का यूपी में मशीनि स्लॉटर हाउस बंद करने वाला बयान अपने कोर वोटर को एक संदेश था । असल में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त भी यूपी के प्रभारी महासचिव थे । उस वक्त भी बीजेपी ने विकास के एजेंडे के साथ-साथ हिंदुत्व के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था । कोशिश थी वोटों का ध्रुवीकरण । जिसमें बीजेपी कामयाब भी रही थी । एक बार फिर अमित शाह यूपी विधानसभा चुनाव में वोटों का ध्रुवीकरण कर राज्य में बीजेपी की जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं ।

मतलब साफ है , उत्तर प्रदेश की सियासत के इस महा समर में सियासत का हर नुमाइंदा शह और मात के खेल में लगा है । कोई मुसलमानों को साधने में लगा है, तो कोई दलितों और स्वर्णों को । सियासत की इस बिसात पर शह और मात का खेल जारी है , जिसका फैसला आगामी 11 मार्च को सामने आ जाएगा ।



अमान अहमद

प्रोड्यूसर

समाचार प्लस

 

इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं । इनसे samacharplus.com का कोई लेना देना नहीं है ।

सियासत के गलियारों में कहा जाता है कि यहां कुछ भी स्थायी नहीं होता, ना दोस्ती और ना ही दुश्मनी। यहां तो मुद्दे भी स्थायी नहीं होते, वक्त के साथ उन्हें गढ़ा जाता है और जरूरत के मुताबिक फिर निकाल लिया जाता है। इसकी ताज़ा मिसाल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के दरमियान बनी नई दोस्ती है। भले ही ये दोनों पार्टियां अब एक दूसरे के साथ हैं, लेकिन इन दोनों के बीच खटास का भी एक लंबा इतिहास रहा है।

कई बार मुलायम ने कांग्रेस का हाथ थामा, तो कई बार उसे छोड़ भी दिया। दोनों की इस दोस्ती का आगाज 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से हुआ। उस वक्त मुलायम सिंह यादव मुसलमानों के लिए कांग्रेस के समर्थन से एक अभियान चला रहे थे। कयास लगाए गए थे कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन होगा, लेकिन अपने धोबी पछाड़ के लिए मशहूर मुलायम ने कांग्रेस को पटखनी दे दी।

कहा जाता है कि मुलायम ने सुबह 4.30 बजे तत्कालीन राज्यपाल सत्य नारायण रेड्डी को फोन कर विधानसभा भंग करने के लिए कहा था। कांग्रेस और सपा के बीच कभी खुशी और कभी गम का माहौल तभी से चला आ रहा है। कभी मुलायम ने कांग्रेस पर सीबीआई का उनके खिलाफ गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगाया, तो 1999 को कौन भूल सकता है, जब कांग्रेस ने सोनिया गांधी को सत्ता तक पहुंचने से रोकने का समाजवादी पार्टी पर आरोप लगाया था। लेकिन इस बार हालात बदले-बदले से नज़र आते हैं।

दोनों ही पार्टियों के नई पीढ़ी के सियासतदां मैदान में हैं। अगर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के दरमियान इस ताज़ा गठबंधन पर नजर डाली जाए तो आंकड़े यही बताते हैं कि टीम अखिलेश और टीम राहुल अगर जमीनी स्तर पर इस गठबंधन के मुताबिक वोट हासिल करने में कामयाब रहे तो उत्तर प्रदेश विधानसभा के नतीजे बेहद चौंकाने वाले साबित हो सकते हैं। अखिलेश और राहुल ने ये फैसला महज ऐसे ही नहीं ले लिया है। इसके पीछे एक गहरी सोच है। दरअसल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन से प्रदेश की कई सीटों पर मामला हार से जीत में बदल सकता है।

अखिलेश ने 2012 में अकेले ही पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। प्रदेश में 29.15 प्रतिशत वोट समाजवादी पार्टी को मिले और कांग्रेस सूबे में चौथे नंबर पर रही। जिसे  11.63 प्रतिशत वोट मिले। दोनों के वोट जोड़ दिए जाएं तो ये आंकड़ा 40.78 प्रतिशत होता है। ये अपने आप में एक जादुई आंकड़ा है, क्योंकि यूपी की राजनीति में महज 25 से 30 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली पार्टी सरकार बनाती आई हैं। लेकिन, तस्वीर के कई और पहलू भी हैं, क्या समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के पास 2012 वाली चमक बरकरार है। क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सत्ता विरोधी लहर लगभग हर चुनाव में देखने को मिलती है। साथ ही जमीनी स्तर पर ये गठबंधन वोटों को भी जोड़ पाएगा ये भी एक बड़ा सवाल है। क्या मुस्लिम वोट एकजुट होकर सपा-कांग्रेस गठबंधन की तरफ जाएंगे या फिर बीएसपी उन्हें अपनी तरफ खींचने में कामयाब रहेगी? 

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन में टीम अखिलेश और टीम राहुल के सामने बड़ी चुनौती वोटों को एकजुट करने की भी है और अगर ये कामयाब रहे तो नतीजे वाकई चौंकाने वाले रहेंगे।

BY- अमन अहमद

2016 का अंत सरकार के दो बड़े आर्थिक फैसलों से हुआ है, पहला नोटबंदी और दूसरा GST। हालांकि इन दोनों फैसलों के प्रभाव से आम जनता पूरी तरह से अनजान है। साल 2017 का बजट दो नए बदलावों का भी गवाह बनेगा...

1-  रेल बजट और आम बजट एक साथ पेश होंगे.
2. इस बार फरवरी के पहले हफ्ते में बजट सत्र शुरू होगा.

नोटबंदी से उबर रहे इस दौर में लोगों को मोदी सरकार के इस बजट से काफी उम्मीदें है। देश की जनता वित्त मंत्री अरुण जेटली से काफी उम्मीदें लगाएं बैठी है। खासतौर पर टैक्स के मोर्चे पर, कहा जा रहा है कि डीमोनिटाइजेशन की वजह से अर्थ व्यवस्था पर पड़े असर को साधने के लिए इनकम टैक्स स्लैब से जुड़े कई अहम फैसले किए जा सकते हैं। कारोबारियों से लेकर निवेशकों तक सब लोग जेटली से ऐसे ऐलान की उम्मीद लगाए बैठे हैं जिससे ग्रोथ को रफ्तार मिल सकेगी।
व्यक्तिगत आयकर छूट सीमा मौजूदा 2.5 लाख रुपए से बढ़ाई जा सकती है।

अलग-अलग जानकार और अर्थशास्त्री इस बारे में अलग-अलग राय और अनुमान रखते हैं। कुछ जानकर मानते हैं कि यह लिमिट ढाई लाख रुपए से बढ़ाकर तीन लाख की जा सकती है जबकि कुछ का मानना है कि यह साढ़े तीन लाख तक भी की जा सकती है। पिछले बजट में जेटली ने सेक्शन 80CCD (1) के तहत नेशनल पेंशन स्कीम में निवेश करने पर 50 हजार रुपए अतिरिक्त टैक्स छूट की अनुमति दी थी। यानी, कुल मिलाकर आप 2 लाख रुपए की छूट ले सकते थे। ये  80C और 80CCD दोनों के तहत निवेश करने पर मिलती है। अब इसमें, जानकार कहते हैं कि सेविंग इंट्रेस्ट रेट कम होने के कारण 50 हजार रुपए से ढाई लाख रुपए तक की छूट मिलनी चाहिए।

दूसरी तरफ जीएसटी के अमल को लेकर अब भी बहुत से सवाल बाकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि ऐसे काफी सवालों का जवाब जेटली साहब के इस बजट में मिल सकता है। हालांकि जीएसटी लागू करने का एक मकसद टैक्स स्लैब को सरल बनाना भी है। लिहाजा इस बात पर भी नजर रहेगी कि कपड़ा, सीमेंट, ऑटो जैसे उद्योगों में अलग-अलग उत्पाद शुल्क का जो इंतेजाम हैं, उसे किस हद तक एकरूप बनाया जा सकता है। वहीं जीएसटी का एक असर यह भी होगा कि बहुत-सी मौजूदा रियायतें खत्म की जा सकती हैं।

जीएसटी के अलावा किसानों के लिए इस बजट से काफी उम्मीदें हैं। खास तौर पर ऐसे वक्त में जब हमारे किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। विकास ब्रांडेड सरकार की एक कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविक जरूरत है। राष्ट्रवाद की तरह यह सिर्फ एक जोश बढ़ाने वाली चीज नहीं है। हकीकत तो ये है कि बदलाव के लिए हमें अपने रास्ते को उत्पादन के बजाय प्रॉफिट पर लाना पड़ेगा। एक तरफ 'इंडिया' है, जो डिजिटल है, कॉरपोरेट है और दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है।

दूसरी तरफ 'भारत' है जो मिट्टी का एहसास कराता है और 'इंडिया' के लिए अनाज उगाता है। एक और अहम बदलाव फल और सब्जियों को एपीएमसी ऐक्ट से बाहर ले जाने का है। इसके पीछे दलील है कि इससे बड़ी संख्या में किसानों को मदद मिलेगी। फल और सब्जियों के उत्पादन के मामले में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर है। नेशनल हॉर्टीकल्चर बोर्ड के मुताबिक, 2014-15 के दौरान भारत में फलों का उत्पादन 86.602 मिलियन मीट्रिक टन रहा। इसी दौरान सब्जियों का उत्पादन 169.478 मिलियन मीट्रिक टन रहा। इस दौरान फलों का पैदावार क्षेत्र 6.110 मिलियन हेक्टेयर रहा। सब्जियों का जुताई क्षेत्र 9.542 मिलियन हेक्टेयर रहा।

मतलब 'अच्छे दिनों' के इस दौर में उम्मीदें तो बहुत हैं, लेकिन 1 फरवरी को जेटली जी के पिटारे क्या ऐलान किए जाएंगे उसपर देश की निगाहें टिकी हुई है।

दिक्कत से दिक्कत या दिक्कत सियासी है !

नोटबंदी से फिलहाल दिक्कत आम को भी और खास को भी दिक्कत तो है । और सबसे ज्यादा दिक्कत हो रही है सड़क से संसद तक नोटबंदी पर सवाल उठा रही पॉलिटिकल पार्टियों को । जो विरोध के लिए हवाला दे रहीं हैं लोगों को हो रहीं दिक्कतों का । तो क्या दिक्कत से दिक्कत है या दिक्कत की वजह कुछ और है ? ये समझने की जरुरत है । असल में आम लोगों की दिक्कतों का हवाला देकर विरोध करने वाली पॉलिटिकल पार्टी ये बताएं कि आम लोग क्या आज दिक्कत में हैं ? आम और गरीब क्या आज लाइन में लगे हैं ? राशन से लेकर अस्पताल, अस्पताल से लेकर सरकारी कार्यालय तक कभी देखा है बदहाल व्यवस्था से जूझते गरीब को ? यहां तक कि पूरे दिन मेहनत-मजदूरी करने वाले मजदूर को तो उसकी मजदूरी भी लाइन में ही लगकर मिलती है । जिसकी ये गैरंटी भी नहीं कि मिलेगी भी कि नहीं । ना जाने कितने लोग सरकारी अस्पताल में बिना इलाज के दम तोड़ देते हैं । कभी देखा है जब गरीब को रिश्वत ना देने पर सरकारी अस्पताल से धक्के मारकर निकाल दिया जाता है । तो वहीं निजी अस्पताल बिना पैसे दिए इलाज करने से इंकार कर देते हैं । कई तो इसलिए जान गंवा देते हैं क्योंकि अस्पताल में डॉक्टर ही नहीं है । कभी देखा है किसी पीड़ित को जो थाने के चक्कर काट-काटकर थक जाता है मगर बिना पैसे दिए इंसाफ तो दूर पुलिस सुनती भी नहीं औऱ वो इसलिए आत्महत्या कर लेता है । कभी गौर किया है जब एक गरीब की बेटी दहेज ना देने पर जला दी जाती है । देश में ना कितने ही गरीब बिन पैसे भूखे पेट सो जाते हैं । क्या कभी उनका दर्द समझने की कोशिश की किसी ने ? कभी सोचा है उन युवाओं के बारे में जो पढ़-लिखकर भी बेरोजगार है । नौकरी नहीं तो पैसे कहां से ? नौकरी के लिए भी तो रिश्वत ही चलती है । बिन मुआवजे के किसान आत्महत्या कर लेता है । बिन पैसे सब सून । फिर दिक्कत आज ही क्यों ? ये सोचने का विषय है कि विरोध की असल वजह है क्या ?  यूपी सरकार ने एलान किया कि कुछ दिन के लिए पुराने नोट रजिस्ट्री में स्वीकार्य होंगे । अब सोचिए क्या गरीब आदमी प्रोपर्टी खरीदेगा ? पहले वो पेट तो भर ले । प्रोपर्टी लेने-बेचने की उसकी हैसियत होती तो वो गरीब नहीं होता । तो सोचिए ये फैसला किनके लिए ? हां अगर राहत देनी ही है तो कुछ ऐसा कीजिए सरकार कि गरीब अपने पुराने नोट भी चला लें और अपना काम धंधा छोड़कर लम्बी लाइनों में भी ना लगना पड़े । यूपी के ही आजमगढ़ में कुछ बच्चों ने अपनी गुल्लक तोड़कर खुले पैसे के जरिए लोगों की मदद के लिए सरकारी अस्पताल में स्टॉल लगाए और काफी लोगों की मदद भी की । कुछ ऐसा ही कर देते । और कुछ नहीं तो सख्त निर्देश अस्पतालों को ही दे दिए जाते कि नोटबंदी की वजह से किसी का इलाज ना रुके । तो क्या ये अस्पताल इलाज के लिए इंकार कर देते ? जहां पुराने नोटों की स्वीकार्यता के सख्त आदेश हैं कम से कम वहां तो ये नोट स्वाकार्य हों  ये प्रतिबद्धता ही दिखा देते । तो क्या जनता यूं परेशान होती ! ये सवाल उन सभी राजनीतिक दलों से । जिनकी कहीं ना कहीं राज्य में अपनी सरकार है । क्या विरोध करने भर से जिम्मेदारी पूरी हो जाती है ? वाकई चिंता है तो सवाल के बजाए समाधान ढूंढिए । माना फैसला केंद्र सरकार का है मगर प्रदेश में तो सरकार आप भी हैं । जनता के प्रति जिम्मेदारी तो आपकी भी है । जनादेश तो आपको भी मिला । फिर कोशिश आपकी की तरफ से क्यों नहीं ? इसलिए ये सवाल कि दिक्कत के लिए दिक्कत है या दिक्कत सियासी है ? 

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