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देश से छुआछूत मिटाने के नाम पर RTI का बड़ा खुलासा

मुरादाबाद- देश से छुआछूत मिटाने के नाम पर केंद्र सरकार ने पानी की तरह पैसा बहाया है। इसके बावजूद भी समाज में अभिशाप बनी यह सामाजिक कुरीतियां ग्रामीण अंचल में अभी खत्म तो नहीं हुई लेकिन जनता का अरबो रुपया इस भेदभाव को खत्म करने के नाम पर खर्च हो गया है। चालू वित्तीय वर्ष के जुलाई माह तक केंद्र सरकार राज्यों को पांच हजार लाख रुपए से अधिक अवमुक्त कर चुकी है। इसमें उत्तर प्रदेश को सबसे ज्यादा ग्यारह सौ लाख रुपए मिले हैं। उत्तर प्रदेश ही नहीं महाराष्ट्र ,मध्य प्रदेश ,राजिस्थान और गुजरात को भी इस भेदभाव को मिटाने के लिए खूब बजट दिया गया। जबकि झारखंड ,उतराखंड ,असम ,पश्चिम बंगाल ,दिल्ली यह कुछ ऐसे राज्य हैं, जहाँ इन चैदह सालों में कुछ लाख रुपए ही दिए गए।

मुरादाबाद निवासी पवन अग्रवाल नामक आरटीआई कार्यकर्ता ने यह खुलासा बढ़ा किया हैं जिन्होंने इसी साल जुलाई 2014 को प्रधानमन्त्री कार्यालय से एक आरटीआई मांगी थी, जिसमे पूछा गया था, कि देश में छुआछूत मिटाने के नाम पिछले चैदह साल में राज्यों और ,नजीओ को वर्षवार कितने रुपए दिए गए तो प्रधानमन्त्री कार्यालय से जो जवाब मिला वह चैकाने वाला था, आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश को इस अवधि में दस हजार लाख रुपए से भी अधिक की धनराशि आवंटित की गई है, इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के हजारो गांव ऐसे हैं, जहाँ न तो अभी छुआछूत मिटी और न ही भेदभाव का अंत हुआ।

दरअसल में केंद्र सरकार प्रदेश की सरकारों को यह धन आवंटित करती है। इस धन को फिर जिलों में बांटा जाता है जिन जगहों पर भेदभाव के मामले ज्यादा मिलते हैं, इन्ही हिसाब से धनराशि मिलती है। अगर उत्तर प्रदेश की बात करें तो पूर्वांचल ,बुन्देलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों गांव ऐसे हैं, जहाँ अभी भी छुआछूत मौजूद है, जात-पात के नाम पर भेदभाव अभी भी जारी है।

वहीं आरटीआई क्टिविट पवन अग्रवाल का कहना है कि, सरकार ने छुआछूत मिटाने के लिए पैसा तो खूब खर्च किया, लेकिन जिस राज्य को पैसे की ज्यादा जरुरत थी, वहां पैसा सबसे कम दिया गया और वहां गलत तरीके से पैसे को आवंटित करके पैसे का दुरुपयोग किया गया है।

 

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