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 नई दिल्लीः इंग्लैंड के खिलाफ पांच टेस्ट मैचों की सीरीज को गंवाने के बाद अब टीम इंडिया बची खुची साख बचाने के लिए पांचवे टेस्ट में उतरेगी। लेकिन इससे पहले ही विवाद हो गया।

टीम इंडिया के कोच रवि शास्त्री ने जब कहा कि उनकी टीम पिछले 15-20 सालों में विदेशों में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली टीम है, तो लोगों को हैरानी व्यक्त की। शास्त्री ने अपने इस बयान पर तर्क भी दिया लेकिन कई लोगों को उनका दिया तर्क गले नहीं उतरा।

एक फैन ने जब इस बारे में कुछ ऐसे आंकड़े सोशल मीडिया पर दिए तो भारतीय टीम के पूर्व स्पिनर हरभजन सिंह इसे रीट्वीट करने से खुद को रोक नहीं सके। हरभजन ने इस तरह शास्त्री के बयान से असहमति जताई।

इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज हारने पर विराट कोहली की टीम के मुख्य कोच रवि शास्त्री ने पुरजोर बचाव किया था। शास्त्री ने कहा था कि मौजूदा खिलाड़ियों ने वो सब हासिल किया है जो कोई अन्य पहले नहीं कर सका।

उनका दावा था कि मौजूदा टीम पिछले 15-20 साल में विदेशों में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली टीम है। भारतीय टीम चौथे टेस्ट में 60 रन से हार गई जिससे वह पांच मैचों की सीरीज में 1-3 से पिछड़ गई। सीरीज में अभी अंतिम मैच होना बाकी है जो शुक्रवार से लंदन के ओवल मैदान पर खेला जाएगा।

हरभजन ने जो ट्वीट किया है उसके मुताबिक टीम इंडिया के एक फैन ने सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़ और एमएस धोनी की कप्तानी के आंकड़े दिए हैं। इन आंकड़ों में बताया गया है कि इन कप्तानों ने भी कम समय में टीम इंडिया को विदेशी पिचों पर तीन से ज्यादा टेस्ट मैच जिताए हैं। 

मेरठः एशियाड गेम्स में अपनी मेहनत का लोहा मनवा चुके सौरभ चौधरी ने एक बार फिर गोल्ड पर निशाना लगाया है। इससे पहले भी सौरभ एशिया के 10 मीटर एयर पिस्टल में गोल्ड मेडल जीत चुके हैं।

उसके बाद लगातार खेलते हुए दूसरा 10 मीटर एयर पिस्टल मिश्रित टीम में कांस्य पदक जीता है। एशियन गेम्स में इतनी छोटी उम्र में बड़ा करनामा करने वाले वो पहले भारतीय निशानेबाज रहे हैं। 

आईएसएसएफ चैंपियनशिप में 16 साल के सौरभ चौधरी ने निशानेबाजी के दम पर दस मीटर एयर पिस्टल के जूनियर वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर देश प्रदेश और अपने परिवार का नाम रोशन किया है। इससे पहले भी मेरठ के गांव कलीना के रहने वाले सौरभ ने एशियाड गेम्स में भी गोल्ड पर निशाना लगाया था।

गुरुवार को फाइनल में सौरभ ने 245.5 अंक हासिल किए, जो जूनियर स्पर्धा में वर्ल्ड रिकॉर्ड है। उधर भारत के ही अर्जुन चीमा (218.0) ने तीसरे स्थान पर रहकर कांस्य पदक जीता। 

सौरभ ने विश्व स्तरीय निशानेबाजी चैंपियनशिप के पांचवें दिन भारत के खाते में गोल्ड मेडल डाला है। इससे पहले उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल मिश्रित टीम कांस्य पदक जीता था।

 इस टूर्नामेंट में भारत अब तक चार स्वर्ण, तीन रजत और चार कांस्य पदक जीत चुका है। इस टूर्नामेंट के इतिहास में भारत का यह सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा है। उधर जूनियर निशानेबाजों के अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए सीनियर्स खिलाड़ियों के प्रति निराशा देखने को मिली है।

नई दिल्लीः पीएम नरेंद्र मोदी ने जकार्ता में हुए एशियाई खेलों के पदक विजेताओं को बधाई दी है। खिलाड़ियों ने आज पीएम मोदी से मुलाकात की। पीएम मोदी सभी खिलाड़ियों से व्यक्तिगत तरीके से मिले और उनसे अनुभव के बारे में पूछा। 

इससे पहले केंद्र सरकार ने मंगलवार को 18वें एशियाई खेलों के पदक विजेताओं को नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया। एशियन गेम्स के इतिहास में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। व्यक्तिगत स्वर्ण पदक विजेताओं को 40 लाख रुपये दिए गए, जबकि रजत और कांस्य पदक विजेताओं को क्रमशः 20 और 10 लाख रुपये दिए गए। 

भारत के एशियाई खेलों के इतिहास में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 15 स्वर्ण, 24 रजत और 30 कांस्य पदक सहित कुल 69 पदक जीते। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के अलावा अन्य केंद्रीय मंत्री किरेन रीजीजू और महेश शर्मा भी इस मौके पर मौजूद थे।

खेल सचिव राहुल भटनागर, आईओए अध्यक्ष नरिंदर बत्रा और साइ की महानिदेशक नीलम कपूर ने भी कार्यक्रम में शिरकत की। 

राजनाथ ने सभी पदक विजेताओं को बधाई दी और कहा कि वह समय दूर नहीं जब भारत दुनिया में खेल की महाशक्ति बनेगा। राजनाथ ने कहा, ‘मैं सभी पदक विजेताओं को बधाई देता हूं और सभी को मेरी तरफ से शुभकामनाएं।

बरेली: चीनी कूंग फू मास्टर की तरह कोच और अखाड़े जैसे माहौल, यहां खिलाड़ी नहीं, लड़ाके तैयार हो रहे हैं। ऐसे लड़ाके जिनको भले ही कभी मेडल के लिए मायूस होना पड़े लेकिन जिंदगी की जंग को हर मोड़ पर जीतने का जज्बा होता है। 

हरीश बोरा की ताइक्वांडो को लेकर कहानी खासी दिलचस्प है। इज्जतनगर मंडलीय रेल कारखाने के कर्मचारी हरीश बोरा उत्तराखंड में रानीखेत के पास पहाड़ी गांव के रहने वाले हैं। पिता भी रेलवे में थे।   

बचपन में एक दिन बाल कटवाने हेयर ड्रेसर की दुकान पर पहुंचे। बाल कटाने को इंतजार करने के दौरान वे वहां रखी पत्रिका पढऩे लगे। पत्रिका में एक जगह कोरियन मार्शल आर्ट ताइक्वांडो की जानकारी के साथ दक्षिण भारत के शहर बेंगलुरु में एक कोच का पता दिया था। उन्होंने वो हिस्सा चुपके से फाड़कर जेब में खोंस लिया। प्रकाशित लेख की बात उनके मन में बैठ गई और एक दिन मां को बताकर साउथ की ट्रेन पकड़ ली। 

वहां पहुंचे तो न कोई उनकी बात समझने वाला, न वे किसी की बोली समझने वाले। काफी धक्के खाने के बाद कोई हिंदी भाषी मिल गया, जिसने पर्चे में छपे पते तक पहुंचा दिया। 

वहां उनके ’मास्टर मिल गए, लेकिन वे ऐसे ही किसी बच्चे को सिखाने को तैयार नहीं हुए।  उन्होंने बहलाकर किशोर हरीश बोरा से घर का पता पूछा और वहां चिट्ठी भेज दी। घर वाले तो उन्हें तलाश ही रहे थे, चिट्ठी मिलते ही चल पड़े। 

पिता वहां पहुंचे लेने लेकिन वह लौटने को तैयार नहीं हुए। सीखने की जिद के साथ पिता से मार खाने का भी डर भी था।  बेटे की इच्छा के आगे पिता का दिल पसीज गया। मन लगाकर सीखने के साथ चिट्ठी-पत्री की हिदायद देकर लौट आए। इसके बाद हरीश बोरा का मार्शल आर्ट का सफर ट्रैक पर शुरू हो गया।

उनके मास्टर ने उन्हें लोहा बनाना शुरू कर दिया। बाद में ब्लैक बेल्ट टैस्ट के लिए कोरिया भेजा। वहां फाइट प्रैक्टिस के लिए कई दिन घर में ही बंद रहे।  ब्लैक बेल्ट लेकर वतन वापसी की। कुछ समय बाद रेलवे में नौकरी भी लग गई।  

इज्जतनगर मंडलीय कारखाने में काम करने के साथ ही उन्होंने ताइक्वांडो सिखाने को समय निकालना शुरू किया। पहले तो सीखने वाले ही नहीं मिल रहे थे। नई तरह की आर्ट थी, जिसमें कोरियन शब्द भी बोले जाते हैं।  चिरैत, घुंघरी, चुंबी, ईल जांग टाइप।  कई लोगों ने मज़ाक भी बनाया लेकिन बोरा जी डटे रहे। 

ये करीब 28 साल पहले की बात है। कहा ये जाता है कि बरेली शहर में इस मार्शल आर्ट को वहीं लाए। आज कई कामयाब कोच उनके शिष्य रहे हैं। हरीश बोरा ने कभी सिखाना बंद नहीं किया।

वे कहते हैं, ये मेरी इबादत है, यही दौलत। आज भी वे ख़ुद जंप करके किक मारकर बताते हैं, जबकि उम्र पचास पार हो चुकी है।  उनकी क्लास के सीनियर कोच इंटरनेशनल खिलाड़ी ब्लैक बेल्ट हैं, लेकिन आज भी कई बार वे उनकी डांट खाते हैं।  

डांट-फटकार के साथ दुलार ऐसा रहता है कि बच्चे भले ही स्कूल बंक कर दें, ट्यूशन छोड़ दें, लेकिन अपने ’अखाड़े की क्लास नहीं छोड़ते। हरीश बोरा कई अन्य मार्शल आर्ट के भी खिलाड़ी हैं।

नई दिल्लीः भारतीय क्रिकेट टीम में तेज गेंदबाजी में धार देने वाले यूपी के तेज गेंदबाज रुद्रप्रताप सिंह ने क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से संन्यास लेने की घोषणा की है। मंगलवार शाम एक भावुक संदेश के साथ उन्होंने  क्रिकेट को अलविदा कह दिया। उन्होंने उसी तारीख को संन्यास लिया जिस तारीख को 13 साल पहले आगाज किया था।

उन्होंने ट्विटर पर एक भावुक संदेश को पोस्ट करके सबका शुक्रिया किया और मैदान पर फिर कभी ना उतरने का ऐलान किया। गौरतलब है कि पिछले कई सालों से आरपी सिंह मैदान से दूर हैं और अब वो पूरी तरह से कमेंट्री पर ध्यान देते हुए नजर आ रहे हैं। 

32 वर्षीय आरपी सिंह पूर्व भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के पसंदीदा गेंदबाजों में शुमार किए जाते थे। टी20 विश्व कप 2007 में जब भारत ने खिताब जीता था तब उस टीम में आरपी सिंह सबसे घातक गेंदबाज साबित हुए थे।

6 दिसंबर 1985 को उत्तर प्रदेश के राय बरेली में जन्मे आरपी सिंह ने अपने संन्यास का ऐलान उसी तारीख को किया जिस दिन उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर का आगाज किया था।

उन्होंने ट्विटर पर जो भावुक विदाई पत्र पोस्ट किया है उसकी शुरुआत भी वहीं से होती है। इस पत्र की पहली पंक्ति यही है कि, ’13 साल पहले आज ही के दिन, 4 सितंबर 2005 को मैंने पहली बार भारतीय जर्सी पहनी थी।’ इसके अलावा उन्होंने इस संदेश में अपने परिवार, बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघ को भी शुक्रिया कहा।

उनके इस विदाई संदेश में भावुक आरपी ने एक जगह लिखा कि, ’मेरी आत्मा और दिल आज भी उस युवा लड़के के साथ है जिसने पाकिस्तान के फैसलाबाद में करियर का आगाज किया था, जो लेदर बॉल को अपने हाथ में रखते हुए सिर्फ खेलना चाहता था। शरीर अहसास दिला रहा है कि अब मेरी उम्र हो चुकी है और युवा खिलाड़ियों के लिए जगह खाली करने का समय आ गया है। 

 

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