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देहरादूनः उत्तराखण्ड के हाईप्रोफाइल एनएच 74 घोटाले में 545 दिनों की एसआईटी जांच के बाद आखिरकार मंगलवार को त्रिवेंद्र सरकार ने दो आईएएस अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया। बताया जाता है कि सरकार ने यह कार्रवाई एनएच 74 घोटाले में जांच रिपोर्ट के आधार पर की है। 

सरकार के फैसले के बाद से ही देहरादून से लेकर जिला मुख्यालय रुद्रपुर में अधिकारियों में हडकंम्प मचा हुआ है। गौरतलब है कि मार्च 2017 में कुमाऊ कमिश्नर को शिकायत मिल रही थी कि एनएच-74 में भूअधिग्रहण को लेकर बड़ा गोलमाल चल रहा है, जिसको लेकर 1 मार्च को तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर डी सिन्थिल पांड्यन उधम सिंह नगर जिला मुख्याल पहुंचे थे।

उन्होंने अधिकारियों संग बैठक कर एनएच-74 में वर्ष 2011 से 2016 की फाइलों को तलब किया जिसके बाद एक जांच कमेटी बैठाई गई। 8 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट देने को कहा गया जांच के दौरान टीम को करोड़ की हेर फेर के अहम दस्तावेज हाथ लगे जिसके बाद कुमाऊ कमिश्नर के निर्देश के बाद 10 मार्च को अपर जिलाधिकारी प्रताप सिंह शाह द्वारा पन्तनगर थाने में मुआवजे घोटाले को लेकर मुकदमा दर्ज करवाया गया।

10 मार्च को कुमाऊ कमिश्नर द्वारा जांच रिपोर्ट शासन को भेजी गई थी। मामले में उच्च स्तरीय जांच कराने के लिए भी प्रस्ताव बनाया गया। 10 मार्च को ही कुमाऊ कमिश्नर के नेतृत्व में जांच कमेटी का गठन किया गया, जिसमें लगभग 200 करोड़ का घपला सामने आया।

18 मार्च को सीएम त्रिवेंद्र रावत ने मुख्यमंत्री की शपथ लेते ही आधा दर्जन पीसीएस अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया। इस मामले की जांच एसआइटी को सौंपी गई थी। साथ ही केंद्र सरकार को सीबीआई जांच की संस्तुति दी गई थी।

26 मई को एनएचआई के चेयरमैन युद्धवीर सिंह का उत्तराखंड के मुख्य सचिव एस रामास्वामी को फोन किया, जिसमे उन्होंने धमकी दी कि अगर इस तरह से एनएचआई के अधिकारियों के खिलाफ जांच चलती रही तो वह एनएचआईए के सभी प्रोजेक्ट उत्तराखंड में रोक देंगे। 

1 जून 2017 तत्कालीन कुमाऊ कमिश्नर का ट्रांसफर कर दिया गया। एसआइटी की जांच पुलिस को ट्रांसफर कर दिया गया। पुलिस कप्तान द्वारा एएसपी कमलेश उपाध्याय के नेतृत्व में एसआईटी गठित की गई।

 

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