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बदायूं: गुलामी की जंजीरों में जकड़े देश को आज़ाद कराने जब रुकुम सिंह मैदान में कूदे थे तब अंग्रेजो के छक्के छूट गये थे। जनपद के शहर से सटे नगला सरकी गांव के एक जमींदार परिवार ने जन्मे कुंवर रुकुम सिंह ने बदायूं में आज़ादी का बुगुल फूंका तो लोग उनके दीवाने हो गये। उनके सपने को पंख तब लगे जब गांधीजी और मदन मोहन मालवीय ने जिले का दौरा किया। कुंवर रुकुम ने अपनी बेटी विद्यावती और बेटे गोवर्धन सिंह को अंग्रेजों के खिलाफ उतार दिया और तब तक शांत नहीं बैठे जब तक आज़ादी नसीब नहीं हुई। लोग आज भी उन्हें कुंवर साहब के नाम से याद करते है। 

बदायूं शहर से सटे नगला सरकी गांव के लोगों की आज़ादी के आंदोलन में हिस्सेदारी के किस्से आज भी लोगों की जुबां पर है। यहां के रहने वाले कुंवर रुकुम सिंह एक जमींदार परिवार से थे उनकी एलएलबी की पढ़ाई के दौरान मध्य प्रदेश के देवास रियासत के राजा से परिचय हुआ उन्होंने रुकुम सिंह को रियासत का महासचिव बना दिया।

अंग्रेजो का जुल्म जब बड़ा तब रुकुम सिंह आज़ादी के आंदोलन में कूद गए और बदायूं लौट आये तब उन्होंने लोगों को इकठ्ठा किया और अंग्रेजो के खिलाफ जंग छेड़ दी। इस आंदोलन को धार 1942 में मिली जब रुकुम सिंह के बुलावे पर महात्मा गांधी और मदन मोहन मालवीय ने बदायूं का दौरा किया। 

कुंवर रुकुम सिंह अपना सन्देश जब भेजते थे तो इसका बीड़ा उनकी बेटी उठाती थीं और अपने हाथ पर लिख कर अपनी झोली में चने लेकर घर से निकल पड़ती थीं और जिसे सन्देश देना होता था उसे अपने हाथ से चना देती और उस हाथ पर लिखा रुकुम सिंह का सन्देश देती थी।

एक बार जब कुंवर रुकुम सिंह ने रेल की पटरी को बम से उड़ा कर अंग्रेजों के आवागमन बाधित करने की योजना बनाई तब रुकुम सिंह के बेटे गोवर्धन सिंह की इस योजना में बहन विद्यावती ने साथ दिया।

गोवर्धन जब रेलवे ट्रैक पर पहुंचे तब खाना देने के बहाने टिफिन में विद्यावती बम लेकर गईं। गोवर्धन सिंह ने रेलवे ट्रैक को ध्वस्त कर अंग्रेजों का आवागमन रोक दिया था। उसके बाद वह अलीगढ़ गए और वहां भी रेलवे स्टेशन पर भीषण बमबारी कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। 

स्वतंत्रता संग्राम के उस समय का अकेला परिवार ऐसा था जब अंग्रेजों ने घर के पिता पुत्र और बेटी को जेल में डाला था। कुंवर रुकुम सिंह ने एक वैदिक इंटर कॉलेज की भी स्थापना की थी जहां वह मीटिंग कर अंग्रेजी समाज के चूल्हे हिला कर रख देते थे। इस विद्यायल में लगभग 220 स्वतंत्रा संग्राम सेनानी एकत्र होते थे और आज़ादी की गाथा लिखते थे। 1968 कुंवर रुकुम सिंह का निधन हो गया। बाद में उनके द्धारा स्थापित कॉलेज का नाम कुंवर रुकुम सिंह वैदिक इण्टर कॉलेज कर दिया गया।

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