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2017 के उपचुनाव में मायावती ने अखिलेश को समर्थन दिया और अखिलेश उपचुनाव जीत गये। जिसको अखिलेश ने एक सफल प्रयोग समझा और अतिउत्साहित होकर धन्यवाद देने मायावती के दरवाजे पहुंच गए। राजनीत की चतुर खिलाड़ी मायावती ने मौके की नजाकत को भांपते हुए बड़ी सियासत की चाल चली। मायावती सभी राजनीतिक कड़वाट भूल कर अखिलेश के साथ आ गई। अखिलेश उपचुनाव की तरह इस बार का लोकसभा चुनाव जितना चाहते थे। पासा पलटा और उनके परिवार के ही सदस्य हार गये। मायावती जानती थी कि अगर वह अकेले लोकसभा चुनाव लड़ेंगी तो स्थिति 2014 जैसी हो सकती है।इसलिए वो सपा के साथ आ गई। इस गठबंधन से बसपा को 10 और सपा बस 5 सीटें मिली।

रविवार को लखनऊ में संपन्न हुई बसपा की राष्ट्रीय स्तरीय बैठक में मायावती समाजवादी नेताओं पर खूब बरसीं। यादव वोट बैंक ट्रांसफर नहीं कराने की तोहमत दोहराने के साथ अनेक सीटों पर बसपा की हार के लिए उन्होंने सपा के नेताओं को दोषी ठहराया इसके साथ ही राष्ट्रीय बैठक में अखिलेश और मुलायम पर कई गम्भीर आरोप लगाये और ऐलान किया कि अब से वह चुनाव अकेले लड़ेंगी। परिवारवाद का लंबे समय तक विरोध करने वाली बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने स्वयं राजनीति में भाई-भतीजा वाद की परम्परा को कायम रखते हुए उन्होने बड़ा ऐलान किया भाई आनंद कुमार को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा भतीजे आकाश आनंद को राष्ट्रीय संयोजक बनाया।

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