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 झांसीः चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी। बुन्देलों के हर बोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी। अपनी झांसी, देश, अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए, अपनी हिम्मत और ताकत से अंग्रेजी हकुमत की ईट से ईट बजा दी थी रानी लक्ष्मीबाई ने। अपनी तेज तलवार से बिजली की तरह कहर बनकर अंग्रेजी मोर्चा को तहस-नहस कर देने वाली रानी लक्ष्मी बाई ने 18 जून 1858 में झांसी के लिए अपनी जान दे दी थी। 

झांसी की रानी के इस बलिदान से देश में आजादी की ऐसी चिंगारी भर दी थी कि वह आग पूरे देश में फैल गई और गुलामी की जंजीरे तोड़कर देश आजाद हो गया। आजादी की पहली वीरांगना कही जाने वाली रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवम्बर 1828 को वाराणसी जिले के भदैनी में हुआ था।

उनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था, लेकिन उन्हें प्यार से मनु भी कहा जाता था। सन 1942 में उनका विवाह झांसी के राजा गंगाराव राव नेवालकार के साथ हुआ था। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई हो गया। रानी लक्ष्मीबाई के नाम से ही झांसी का किला जाना जाता है। यह किला झांसी में बंगरा नामक पहाड़ी पर 1613 ईस्वी में राजा वीरसिंह जूदेव ने बनवाया था। यह किला 15 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें 22 बुर्ज और दो तरफ खाई है। नगर की दीवार में 10 द्वार और 4 खिड़किया थी। 

झांसी से किले से कुछ दूरी पर रानी का महल बना हुआ था। जिसे आज भी रानी महल के नाम से जाना है। इस महल में जाने से आज भी रानी लक्ष्मीबाई की यादें ताजा होती हैं। महल की दीवारों पर बनाई गई नक्कासी और लकड़ी की छत देखने में बनती है। इसी महल से वह किले में जाती और फिर वहां जनता की दरबार लगाती हैं। 

झांसी किले के बीचो-बीच ऐतिहासिक शिवमंदिर है। यह मंदिर रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य और पराक्रम की याद दिलाता है। इस शिव मंदिर को मराठा और बुन्देलखंड स्थापत्य शैली से बनाया गया है। बताया जा रहा है कि जब लक्ष्मीबाई महारानी बनकर झांसी पहुंची थी तो उन्होंने इस मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया था। इसी मंदिर में रानी लक्ष्मीबाई अपने महल से प्रतिदिन आकर शिव दर्शन कर पूजा अर्चना करती थी। 

झांसी किले में पंचमहल भी बना हुआ है। जहां पर रानीलक्ष्मी बाई अपनी सभा करती थी। इसी पंचमहल से उन्होंने एक नारा भी दिया कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। इसी नारे के साथ रानी ने अंग्रेजों से युद्ध को बिगुल फूंका था। 

1857 में रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी और देश को बचाने के लिए अंग्रेजों से युद्ध का विगुल फूंका था। इसके लिए रानी लक्ष्मीबाई ने सेना में महिलाओं की भर्ती की और उन्हें प्रशिक्षण दिया।    झलकारी बाई रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल थी जिस कारण उन्हें सेना में प्रमुख स्थान दिया गया था। अंग्रेजों से युद्ध में एक विशाल तोप का उपयोग किया गया था। जिसे कड़क बिजली तोप कहते है। इस तोप को केवल गुलाम गौस चलाते थे। इस तोप के चलने से अंग्रेजों के दिल भी दहल जाते थे। 

झांसी को बचाने के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने बागियों की फौज तैयार करने का फैसला किया। उन्हें गुलाम गौस ख़ान, दोस्त ख़ान, खुदा बख़्श, सुंदर-मुंदर, काशी बाई, लाला भऊ बख़्शी, मोती भाई, दीवान रघुनाथ सिंह और दीवान जवाहर सिंह से मदद मिली। 1857 की बगावत ने अंग्रेज़ों का फोकस बदला और झांसी में रानी ने 14000 बागियों की सेना तैयार की।

रानी लक्ष्मीबाई, अंग्रेज़ों से भिड़ना नहीं चाहती थीं लेकिन सर ह्यूज रोज़ की अगुवाई में जब अंग्रेज़ सैनिकों ने हमला बोला, तो कोई और विकल्प नहीं बचा। रानी को अपने बेटे के साथ रात के अंधेरे में भागना पड़ा।  

ग्वालियर के फूल बाग इलाके में मौजूद उनकी समाधि आज भी मर्दानी की कहानी बयां कर रही है। हम सभी ने लक्ष्मीबाई की कहानी सुनी है, लेकिन सुभद्राकुमारी चौहान ने अपनी कलम के ज़रिए उनकी जो बहादुरी हमारे सामने रखी, उसकी मिसाल दूसरी कोई नहीं।

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